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चौपाल: अनुभव का खेल

जहां तक विश्व कप के लिए भारतीय टीम में खिलाड़ियों के चयन का प्रश्न है तो स्थिति यह है कि देश में हर क्रिकेट प्रेमी प्रत्येक मैच में अपने नए हीरो के प्रदर्शन को देखने के बाद एक नई टीम सुझाने लगता है।

महेंद्र सिंह धोनी (PTI Photo)

जिस तरह क्रिकेट अपने प्रारूप में सिमटता जा रहा है जैसे टैस्ट क्रिकेट से एकदिवसीय क्रिकेट, एकदिवसीय क्रिकेट से टी-20 क्रिकेट और फिर टी-20 से टी-10 क्रिकेट, उसी प्रकार दर्शक भी स्वभावत: अपने क्रिकेटीय नजरिये में सिमटते दिख रहे हैं। कोई एक मैच में अच्छा प्रदर्शन कर देता है तो हम उसे हीरो बना देते हैं और लंबे समय से खेलते आ रहे खिलाड़ियों से तुलना करने लगते हैं पर यह भूल जाते हैं कि जिससे तुलना कर रहे हैं उसके पास लंबा अनुभव होता है। जहां तक विश्व कप के लिए भारतीय टीम में खिलाड़ियों के चयन का प्रश्न है तो स्थिति यह है कि देश में हर क्रिकेट प्रेमी प्रत्येक मैच में अपने नए हीरो के प्रदर्शन को देखने के बाद एक नई टीम सुझाने लगता है। अभी कुछ समय पहले यह चर्चा हर समीक्षक की जुबान पर थी कि ‘धोनी का विश्व कप की टीम के लिए चयन किया जाना चाहिए या नहीं?’ पर अब शायद इसका जवाब हर किसी को मिल गया है। इसी प्रकार की दबाव की स्थिति से सचिन तेंदुलकर को भी गुजरना पड़ा था जिसका जवाब उन्होंने 2011 के विश्व कप में भारत के लिए सर्वाधिक रनों का योगदान करते हुए दिया और विश्व कप जिताने में अहम भूमिका निभाई थी।

दरअसल, हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि प्रत्येक विश्व कप विजेता टीम में उसके अनुभवी खिलाड़ियों ने अहम भूमिका निभाई है। मसलन, 1975 और 1979 की विश्व कप विजेता टीमों में क्रमश: क्लाइव लायड और विवियन रिचर्ड ने वेस्टइंडीज के लिए, 1983 में मोहिंदर अमरनाथ और सुनील गावस्कर ने भारतीय टीम के लिए, 1987 में डेविड बून तथा एलेन बोडर ने आॅस्ट्रेलिया के लिए, 1992 में इमरान खान और जावेद मियांदाद ने पाकिस्तान के लिए, 1996 में अरविंद डिसिल्वा और अर्जुन रणतुंगा ने श्रीलंका के लिए,1999 में स्टीव वाग, 2003 में शेन वार्न और 2007 में विश्व ग्लेन मैकग्राथ ने आॅस्ट्रेलिया के लिए, 2011 में सचिन तेंदुलकर ने भारत के लिए और 2015 में माइकल क्लार्क ने आॅस्ट्रेलिया के लिए अहम भूमिका निभाई है।

इससे यही कहा जा सकता है कि अनुभवी खिलाड़ियों की मौजूदगी से टीम के अन्य खिलाड़ियों का भी प्रदर्शन ऊंचा हो जाता है क्योंकि सीनियर खिलाड़ी जहां अपने अनुभव और खेल से पूरी टीम को अच्छा प्रदर्शन करने के लिए प्रेरित करते हैं वहीं युवा खिलाड़ी भी अपनी चुस्ती-फुर्ती और जोश से टीम को सदैव ऊर्जा से भरते हैं। अनुभवी खिलाड़ियों को नजरअंदाज करके केवल युवा कंधों पर विश्व कप जिताने की जिम्मेदारी देना उचित नहीं होगा।
’अभिषेक कुमार मिश्रा, इलाहाबाद

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