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चौपाल: संवाद का सफर

समय काटने के लिए अब वे ग्यारह बजे के बाद पास के मेट्रो स्टेशन तक चले जाते हैं और लंबी दूरी तक की किसी मेट्रो में सवार हो जाते हैं। ग्यारह बजे तक मेट्रो की भीड़ लगभग छंट चुकी होती है सो उन्हें सीट भी मिल ही जाती है।

Author July 9, 2019 1:58 AM
अगर नाती-पोतों से दादी या नानी अपनी भाषा में बातें करती हैं, तब बच्चे मुंह बिचकाते हैं।

उदारीकरण, भूमंडलीकरण और संचार क्रांति के इस दौर में संवाद हीनता का पुरजोर बोलबाला है। महानगरों में पहले की तरह निस्संकोच बतियाना अब इतना सहज नहीं रह गया है। जान-पहचान का हर कोई अपने आप में व्यस्त है। किसी के पास किसी के लिए समय नहीं। पर कहते हैं न, जहां चाह वहां राह। अलग-अलग शहरों में रहने वाले मेरे परिचित दो बुजुर्गों ने सेवानिवृत्ति के बाद समय काटने और संवाद रत होने का एक अनोखा तरीका अख्तियार कर लिया है। उनका स्वास्थ्य अभी अच्छा है। सुबह की सैर के बाद वे घर लौट कर आते हैं, नहाने-धोने और चाय-नाश्ते से निपटने तक ग्यारह तो बज ही जाते हैं। अब ग्यारह से लेकर शाम पांच-छह बजे तक का समय काटना उनके लिए मुश्किल हो जाता था।

आखिर कितना टीवी देखें और टीवी में भी अब कुछ रुचिकर नहीं लगता। एक की पत्नी तो बहुओं, नाती-पोतों में व्यस्त हो जाती हैं। अन्य के बहू-बेटे, नाती-पोते दूसरे शहर में रहते हैं और उनकी पत्नी का कुछ समय पहले ही इंतकाल हुआ है सो वे अकेले ही रहते हैं। समय काटने के लिए अब वे ग्यारह बजे के बाद पास के मेट्रो स्टेशन तक चले जाते हैं और लंबी दूरी तक की किसी मेट्रो में सवार हो जाते हैं। ग्यारह बजे तक मेट्रो की भीड़ लगभग छंट चुकी होती है सो उन्हें सीट भी मिल ही जाती है। एक-डेढ़ घंटा भांति-भांति के लोगों के बीच वे गुजारते हैं। बहुत बार अजनबी मुसाफिरों से विभिन्न मुद्दों पर बातचीत भी हो जाती है जिससे मन तरोताजा हो उठता है। यात्रा करने से शारीरिक सक्रियता भी हो जाती है। दोपहर तीन बजे तक लौट, खाना खाते ही विश्राम के बाद शाम छह बजे ही उठना होता है। शाम की दिनचर्या के बाद रात को भरपूर नींद का आनंद मिलता है शारीरिक और मानसिक दोनों तरह की संतुष्टि मेट्रो के सफर के दौरान जो मिल चुकी होती है।
’सुमित्रा महरौल, श्याम लाल कॉलेज, दिल्ली

अधिकार बनाम कर्तव्य
पर्यावरण की समस्या आज भारत ही नहीं बल्कि विश्व की सबसे अहम समस्या बन कर हमारे सामने आ रही है पर भारत की स्थिति अन्य देशों की अपेक्षा बेहद चिंताजनक है। विकास की ऊंची सीढ़ियां बनाने में हम इतने लीन हो गए कि वृक्षों को काट डाला, जंगलों को उजाड़ दिया, पेड़ लगाने बंद कर दिए, झीलों को पाट कर मॉल बना दिए, प्रदूषण की चिंता किए बिना प्लास्टिक का प्रयोग किया और अपने पैरों में स्वयं कुल्हाड़ी मार ली। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 (प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण) के तहत प्रत्येक सरकार का दायित्व है कि वह अपने नागरिकों को स्वस्थ एवं स्वच्छ पर्यावरण उपलब्ध कराए! शायद यह आपको पता होगा क्योंकि यह आपका अधिकार है पर यह जरूर नहीं पता होगा कि अनुच्छेद 51 (क) के तहत प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और उसका संवर्धन करना हमारा मौलिक कर्तव्य भी है।

अपने मौलिक अधिकारों के लिए हमेशा सजग रहने वाले हम भारतीय कर्तव्यों को निभाने में बहुत पीछे रह जाते हैं जिसके भयावह परिणाम आज सबके सामने हैं। ऐसे में आवश्यकता है अपने अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्यों का निर्वाह करने की। पर्यावरण को बचाना केवल सरकार विशेष की जिम्मेदारी नहीं है, यह एक सामाजिक कर्तव्य है कि जिस समाज में हम सांस लेते हैं उसे सर्वप्रथम सांस लेने योग्य बनाए रखा जाए।
’मुकुल सिंह चौहान, जामिया मिल्लिया, दिल्ली

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