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चौपाल: दावे और हकीकत व एनआरसी से परहेज

बीते 10 सालों में करीब 10 लाख उपलब्ध आवेदकों की तुलना में कुल प्राध्यापकों की रिक्तियां सिर्फ पांच लाख हैं।

Author Published on: September 21, 2019 2:28 AM
सांकेतिक तस्वीर।

श्रम राज्यमंत्री संतोष गंगवार ने उत्तर भारत के युवाओं में कौशल की कमी बता कर भले ही एक नई राजनीतिक बहस छेड़ दी हो लेकिन आंकड़े कुछ और ही हकीकत बयान कर रहे हैं। यह कोई पहला मौका नहीं है जब युवाओं को नौकरी न दे पाने की तोहमत उनकी योग्यता पर लगाई गई हो। बीते कुछ वर्षों से लगातार यह प्रचारित किया जाता रहा है कि उच्च शिक्षा में रिक्तियों की पूर्ति न हो पाने की एक बड़ी वजह देश में शिक्षक बनने लायक पात्र युवाओं की अनुपलब्धता है। लेकिन यह तर्क इसलिए सटीक नहीं बैठता कि अखिल भारतीय उच्च शिक्षा सर्वे की रिपोर्ट के मुताबिक प्रति वर्ष 25 हजार युवा पीएचडी की उपाधि प्राप्त कर रहे हैं। इसके अलावा यूजीसी, आईसीए और आईसीएस द्वारा आयोजित नेट परीक्षा में औसत 50 हजार युवा जेआरएफ या नेट परीक्षा पास करते हैं।

राज्यों की सेट परीक्षा में 25-30 हजार युवा सफल होते हैं। कुल मिलाकर उच्च शिक्षा संस्थानों के लिए हर साल करीब एक लाख दावेदार शिक्षक उपलब्ध होते हैं। बीते 10 सालों में करीब 10 लाख उपलब्ध आवेदकों की तुलना में कुल प्राध्यापकों की रिक्तियां सिर्फ पांच लाख हैं। यदि सभी रिक्त पद भर दिए जाएं तब भी पांच लाख योग्य आवेदक शेष रह जाएंगे। साफ है कि समस्या युवाओं में कौशल की कमी की नहीं उन्हें नियुक्त करने की इच्छा शक्ति की है।

यदि केंद्र और राज्य सरकार मिल कर एक यथेष्ठ कार्ययोजना के तहत देश के सभी उपलब्ध योग्य आवेदकों का पंजीयन करें तो यह बात खुद ही साफ हो जाएगी कि देश में काबिल युवाओं की कोई कमी नहीं है। इन युवाओं को दरकिनार कर बुजुर्ग सेवानिवृत्त प्राध्यापकों से काम चलाना न तो समस्या का स्थायी समाधान है और न ही इससे अपेक्षित परिणामों की उम्मीद की जा सकती है। अगर हम वाकई भारत को फिर से विश्व गुरु के पद पर प्रतिष्ठित करना चाहते हैं तो उच्च शिक्षा में बढ़ रहे नामांकन के अनुपात में शिक्षकों की रिक्तियों की पूर्ति की जाए और काबिल, ऊर्जावान युवाओं को देश का भविष्य संवारने के लिए इन पदों पर नियुक्त किया जाए।

’देवेंद्र जोशी, महेश नगर, उज्जैन

एनआरसी से परहेज

राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर यानी एनआरसी लागू करना राज्यों ही नहीं, देश की सुरक्षा की दृष्टि से भी बहुत महत्त्वपूर्ण है। लेकिन पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा है कि वे अपने राज्य में एनआरसी लागू नहीं होने देंगी। राजनीतिक फायदे के लिए ममता बनर्जी एनआरसी का विरोध कर अपने वोट बैंक यानी वर्षों से पश्चिम बंगाल में रह रहे बांग्लादेशी घुसपैठियों को बचाना चाहती हैं। तुष्टिकरण की नीति पर चलने वाली कांग्रेस के हश्र से तृणमूल कांग्रेस को कुछ तो सबक लेना चाहिए।

’राम मूरत ‘राही’, सूर्यदेव नगर, इंदौर

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