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चौपाल: चौथी बार

भारत को अब यह अच्छी तरह समझना होगा कि हमारा सबसे बड़ा दुश्मन चीन है न कि पाकिस्तान। भारत का दावा है कि सुरक्षा परिषद के स्थायी और अस्थायी सदस्य देश भारत के साथ खड़े हैं।

Xi Jinpingचीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग। (AP Photo)

जिसकी आशंका थी वही हुआ। दस साल में चौथी बार जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अजहर को हम सुरक्षा परिषद से वैश्विक आतंकी घोषित नहीं करा पाए। लगता है, घोषित हो भी जाता तो यह महज सांकेतिक होता। इससे उसकी आतंकी गतिविधियों पर खास फर्क नहीं पड़ता। केवल विदेशों में उसके खाते जब्त होते और अंतरराष्ट्रीय यात्राओं पर रोक लगती। अभी कौन सा वह दुनिया भर में घूमता रहता है! दरअसल, जब तक पाकिस्तानी अवाम और वहां की हुकूमत उसके साथ है भारत का सरदर्द कम नहीं होने वाला। भारत को अब यह अच्छी तरह समझना होगा कि हमारा सबसे बड़ा दुश्मन चीन है न कि पाकिस्तान। भारत का दावा है कि सुरक्षा परिषद के स्थायी और अस्थायी सदस्य देश भारत के साथ खड़े हैं। तो क्या हम अमेरिका से यह आग्रह नहीं कर सकते कि वह अपनी ओर से पाकिस्तान पर प्रतिबंध लगाए जैसे उसने ईरान पर नकेल कसी है! इसमें संयुक्त राष्ट्र की सहमति भी नहीं थी। मगर अमेरिका ऐसा नहीं करेगा। हमें अपनी लड़ाई खुद से लड़नी होगी।
’जंग बहादुर सिंह, गोलपहाड़ी, जमशेदपुर

आम बनाम खास
आंध्रप्रदेश स्थित विश्व प्रसिद्ध मंदिर तिरुपति बालाजी में वीआइपी दर्शन की व्यवस्था खत्म कर दी गई है। देर से ही सही, पर मंदिर प्रशासन का यह निर्णय सराहनीय है। देश के कई मंदिरों ने यह व्यवस्था कर रखी है। किसी वीआइपी के आने पर उसे लाइन से अलग हटा कर खास दर्शन करा दिया जाता है। वहीं दूसरी ओर आम श्रद्धालुओं को दर्शन के लिए लंबा इंतजार करना होता है और परेशानी उठानी पड़ती है। इससे आम लोग खुद को भेदभावपूर्ण व्यवहार का शिकार मानते हैं। सभी मंदिरों में नेता, मंत्री, कलाकार, उद्योगपति, खिलाड़ी, अधिकारी आदि कोई भी हो, उसे आम लोगों की तरह लाइन में लगकर दर्शन करने चाहिए। हमें ‘वेरी इंपोर्टेंट पर्सन’ के स्थान पर ‘एवरी पर्सन इज इंपोर्टेंट’ की सोच विकसित करनी होगी। चलने में असमर्थ बुजुर्ग और दिव्यांग श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए पृथक से दर्शनों की व्यवस्था करना उचित होगा।
’राजेंद्र कुमावत, जयपुर

विषमता का विकास
भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन के मुताबिक पूंजीवाद खतरे में है। उनका कहना है कि पूंजीवाद को जो खतरा है उसका कारण बढ़ती असमानताएं हैं। यह बात काफी हद तक सही भी साबित होती नजर आ रही है क्योंकि 2018 की आॅक्सफैम रिपोर्ट के मुताबिक भारत की कुल जनसंख्या के एक प्रतिशत लोगों के पास देश का 73 फीसद धन है। इस रिपोर्ट का यह भी कहना है कि 2006 से 2015 तक जहां एक सामान्य मजदूर की वार्षिक आय में केवल दो प्रतिशत की वृद्धि हुई है वहीं लखपतियों की आय में छह गुना अधिक वृद्धि हुई है।
दरअसल,भारत में 1991 के बाद उदारवाद, निजीकरण और वैश्वीकरण आने से विकास तो हुआ लेकिन इस विकास के पथ पर एक पक्ष धीरे-धीरे पीछे छूटता चला गया जिसे लोग आज असमानता के रूप में जान रहे हैं। भारत उदारवाद, निजीकरण और वैश्वीकरण के सिद्धांत के अनुसार शिक्षा का माहौल नहीं बना सका। नतीजतन, जनसंख्या बढ़ती चली गई और लोगों के पास कौशल की कमी होती चली गई जिससे यहां व्यापक असमानता नजर आती है।
’अभयजीत कुमार सिंह, दिल्ली

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