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चौपाल: सुधार की चुनौती

आखिर जब झंडा, पोस्टर, बैनर, बिल्ले आदि पर प्रतिबंध लगा दिया गया है तब चुनावी खर्च पर लगाम लगाने का असरदार तरीका चुनाव आयोग क्यों नहीं खोज पा रहा है? लगता है, राजनीतिक दलों के सामने आयोग लाचार है।

Author Published on: March 14, 2019 3:45 AM
लोकसभा चुनाव के मद्देनजर पुरानी दिल्ली के सदर बाजार में प्रचार सामग्री आ चुकी है। इनमें राजनीतिक दलों के झंडे, बैज और अन्य प्रॉप्स शामिल हैं। (एक्सप्रेस फोटोः अभिनव साहा)

पिछले कुछ वर्षों में चुनाव आयोग की सक्रियता के कारण प्रचार के कानफोड़ू शोर और बैनर-पोस्टरों से होने वाले चुनावी प्रदूषण से देशवासियों को थोड़ी राहत मिली है। आचार संहिता लागू होने के बाद जो माहौल अब देखने को मिलता है वह कुछ वर्ष पहले नदारद था। चारों तरफ बैनर-पोस्टर और गाड़ियों में लगे लाउडस्पीकरों के कारण लोगों को अपने दैनिक जीवन में बहुत-सी असुविधाओं का सामना करना पड़ता था। चुनाव प्रचार की गाड़ियों से कई बार ऐसे हादसे हो जाते थे जिनमें किसी की जान भी चली जाती थी।

वैसे तो आज भी भारत के चुनावी माहौल में अनेक विसंगतियां हैं जिन्हें सुधारने की जिम्मेदारी और चुनौती दोनों चुनाव आयोग के सामने हैं। सर्वे से यह पता चल रहा है कि इस बार हमारी सत्रहवीं लोकसभा का चुनाव 2016 के अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव से भी महंगा होगा। अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव में कुल साढ़े पांच अरब डॉलर खर्च हुए थे जबकि मौजूदा लोकसभा चुनाव के लिए अंदाजा लगाया जा रहा है कि इस पर छह अरब डॉलर से ऊपर खर्च होने हैं। जब देश में किसान, मजदूर, छात्र और अतिथि शिक्षकों को अपने हक के लिए सड़कों पर उतर कर कई-कई दिनों, महीनों तक आंदोलन करना पड़े और फिर भी उन्हें हक न मिले तो चुनाव में अरबों रुपए खर्च करना निहायत अफसोसनाक ही कहा जाएगा।

आखिर जब झंडा, पोस्टर, बैनर, बिल्ले आदि पर प्रतिबंध लगा दिया गया है तब चुनावी खर्च पर लगाम लगाने का असरदार तरीका चुनाव आयोग क्यों नहीं खोज पा रहा है? लगता है, राजनीतिक दलों के सामने आयोग लाचार है। क्या आयोग के पास ऐसी कोई योजना नहीं है जिससे इन दलों के काले पैसे का चुनाव में इस्तेमाल रोका जा सके? जो पैसा चुनाव जीतने के लिए पानी की तरह बहाया जाता है उसे देशवासियों के कल्याण मेंं लगाया जाना चाहिए। काला धन आम जनता के पास नहीं होता, वह तो बड़े पूंजीपतियों और बड़ी सियासी पार्टियों के पास होता है जिसे खर्चने का सुविधाजनक समय चुनाव ही होता है। चुनाव आयोग यदि इस गंभीर मुद्दे पर काम करे और बेलगाम चुनावी खर्च पर सख्ती से नियंत्रण कर सके तो आने वाले समय में हम साफ-सुथरे चुनाव और एक मजबूत लोकतंत्र होने का दावा कर सकते हैं।
’सुशील कुमार शर्मा, विश्वास पार्क, नई दिल्ली

रंग-बदरंग
अंग्रेजी में तो ‘होली’ का अर्थ पवित्र ही है मगर बड़े अफसोस की बात है कि विशेषकर उत्तर भारत में हर वर्ष होली बड़े ही गंदे तरीके से मनाई जाने लगी है। लोग एक-दूसरे पर गंदे रंग, कीचड़ और गोबर तक फेंकते हैं जिससे पानी की बर्बादी होने के साथ ही न जाने कितने वस्त्र, दीवारें और फर्श आदि तक बुरी तरह गंदे हो जाते हैं। तेजाबी रंग और पानी के गुब्बारे अचानक चलते वाहनों पर फेंके जाते हैं जो पत्थर की तरह लगते हैं। इनसे महिलाएं, बुजुर्ग और बच्चे घायल होते हैं और दुर्घटनाएं तक हो जाती हैं। रंग-बिरंगे रासायनिक गुलाल और मिट्टी के घटिया रंग भी मुंह पर जबरदस्ती लगा दिए जाते हैं जिससे आंखें खराब होती हैं। कई जगह तो मशीनों का काला तेल, ग्रीस और केमिकल के पानी से भी लोग परहेज नहीं करते। शराब के नशे में बाइकों पर चार-चार लोग सवार होकर हुड़दंग करते फिरते हैं। सबसे अच्छा तरीका तो साफ-सुथरे तरीके और आपस में प्रेम और भाईचारे के साथ प्राकृतिक रंगों से होली मनाना है।
’वेद मामूरपुर, नरेला, नई दिल्ली

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