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चौपाल: जाति की जकड़ व नापाक मंसूबे

समाज में वैज्ञानिक तरक्की का डिजिटल दौर भी इस जातीय अहंकार को बढ़ावा देने का औजार बन गया है।

Author Published on: November 12, 2019 3:03 AM
जाति आधारित समाज में जाति की समाप्ति का जो आधारभूत आंदोलन चलना चाहिए था।

कुछ दिन पहले उत्तर प्रदेश पुलिस ने गौतम बुद्ध नगर में सैकड़ों ऐसे वाहनों का चालान किया जिन पर अहंकार भरे जातिसूचक शब्द लिखे थे। पिछले कुछ समय से वाहनों पर जाति लिखने का चलन बढ़ता जा रहा है। आजादी के बाद से ही जाति बताने की यह प्रवृत्ति राजनीतिक रूप से फायदेमंद मान कर राजनीति में भी खूब चलती रही है। जाति का मसला दुनिया में अपनी तरह का अलग ही है। बाकी विश्व में ऊंच-नीच पर आधारित इस तरह की व्यवस्था शायद ही कहीं पाई जाती हो। जाति पर टिके भारतीय समाज में जातिवाद को समाप्त करने के जितने प्रयास हुए उनमें बहुत ज्यादा ईमानदारी नहीं रही। सरकार के स्तर पर भी अधूरे मन से कोशिशें हुर्इं।

जाति आधारित समाज में जाति की समाप्ति का जो आधारभूत आंदोलन चलना चाहिए था, उसके लिए भी ईमानदारी से प्रयास ही नहीं किए गए क्योंकि आजादी के बाद राजनीति की धुरी जाति ही बनी। जाति के गुणा-भाग के हिसाब से राजनीतिक पार्टियां भी बनीं। जाति के गणित को देख कर टिकट बांटे गए, मंत्रालय दिए गए और पदों की बंदरबांट हुई। जाति के आधार पर ही वोट मांगे जाते रहे। मीडिया ने भी चुनावों को जाति के नजरिए से देखा। आज भी जातीय समीकरण देख कर चुनाव की खबरें लिखी जाती हैं। मीडिया चुनाव क्षेत्र में बाकायदा विभिन्न जातियों के मतदाताओं की संख्या को आधार बना कर गिन कर रिपोर्टिंग करता है।

हजारों साल के जातीय अहंकार की प्रदर्शनी पहले तो जाति सूचक उपनामों में ही दिखती थी, फिर दुकानों, घरों और प्रमाणपत्रों से होती हुई यह बीमारी वाहनों तक आ गई है, जहां बहुत आक्रामक रूप में अत्यंत दर्प से भरे जाति के नाम राह चलते देखने को मिल जाते हैं। कल हो सकता है कि लोग अपने वस्त्रों पर भी जाति लिखवा कर चलने लगें!

समाज में वैज्ञानिक तरक्की का डिजिटल दौर भी इस जातीय अहंकार को बढ़ावा देने का औजार बन गया है। फेसबुक, व्हाट्सएप और अन्य सोशल मीडिया मंचों को भी लोगों ने जातिवाद का मंच लिया है। दरअसल, हम जितने आधुनिक साधनों से संपन्न होते जा रहे हैं उतने ही संकीर्ण जातिवादी सोच से ग्रस्त होते जा रहे हैं। वैज्ञानिकता, तार्किकता, संवैधानिक मूल्य सब जाति के नाम के आगे बेमानी हो जाते हैं। एक लोकतांत्रिक समाज में जाति सूचक शब्द समानता और समरस समाज के निर्माण की राह में बाधक हैं। अब भी समय है कि जाति की संकुचित अहंकारी सोच पर रोक लगे और जाति की समाप्ति के सार्थक प्रयास भी किए जाएं।

’बिजेंद्र कुमार, आंबेडकर कॉलेज, दिल्ली

नापाक मंसूबे

करतारपुर गलियारे के होर्डिंग्स में पाकिस्तान ने तीन खालिस्तानी नेताओं को भी दिखाया जिससे उसकी मंशा साफ हो गई है। साफ है कि वह करतारपुर गलियारे की आड़ में खालिस्तान समर्थकों को उकसाने का काम कर रहा है। पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने इस संदर्भ में एकदम सही कहा कि पाकिस्तान एक तरफ से प्यार जता रहा है और दूसरी तरफ से गड़बड़ करने की कोशिश में लगा है। भारत को पाकिस्तान के नापाक मंसूबों से सावधान रहना होगा।

’रवि प्रशांत, नई दिल्ली

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