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चौपाल: प्रदूषण की राजधानी व नीचे की ओर

पर्यावरण प्रदूषण के लिए किसानों द्वारा जलाई जा रही पराली को ही दोष देना किसानों के साथ अन्याय है।

Author Published on: November 14, 2019 2:45 AM
दिल्ली जैसे प्रदूषण के शिकार शहरों में आने वाली हवाएं उनके पास-पड़ोस के क्षेत्रों में जलाई जा रही धान की परालियों से उठते धुएं के कारण विषाक्त हो गई हैं।

हवाओं का यह स्वभाव होता है कि वे जिन क्षेत्रों से होकर गुजरती हैं, वहां के वायु मंडल में उपलब्ध सुगंध-दुर्गंध, धुएं और धूल के कण, विषैली गैसों आदि को साथ लेकर बहती रहती हैं। जिस प्रकार पहाड़ों से आने वाली हवाएं सर्द और नदी के ऊपर से बहती हवाएं भीगी यानी नम होती हैं, ठीक उसी प्रकार दिल्ली जैसे प्रदूषण के शिकार शहरों में आने वाली हवाएं उनके पास-पड़ोस के क्षेत्रों में जलाई जा रही धान की परालियों से उठते धुएं के कारण विषाक्त हो गई हैं। सचमुच, सत्संग और कुसंग का प्रभाव चरितार्थ होता दीख रहा है।

दिल्ली को देश की नाक कहा जाता है। यहां के सौंदर्यीकरण और स्वच्छता पर हो रहा खर्च देश के सभी राज्यों में हो रहे खर्च से अधिक है, फिर भी दिल्ली अब पर्यावरण-प्रदूषण के चलते भयावह हो गई है। कुछ दिन ही हुए जब दिल्ली के मुख्यमंत्री ने जनता को अपने घरों की खिड़कियां न खोलने, सुबह सैर पर न निकलने की सलाह दी थी। सहज ही प्रश्न उठता है, आखिर कब तक लोग इस तरह बिल में रहने वाले जंतुओं की सी जिंदगी बसर करेंगे और कब तक स्वास्थ्य के लिए अत्यावश्यक सुबह की सैर पर नहीं जाएंगे? यह तो पर्यावरण प्रदूषण से बचने का स्थायी उपाय नहीं प्रतीत होता क्योंकि दिल्ली में ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो अपनी रोजी-रोटी के लिए दिल्ली की सड़कों पर पैदल या साइकिल से चलते हैं। वे कैसे घर में बैठे रह सकते हैं?

ऐसा नहीं है कि पर्यावरण-प्रदूषण की शिकार केवल दिल्ली है। मैं कुछ दिनों के लिए वाराणसी गया हुआ था। वहां के पर्यावरण की स्थिति दिल्ली से बहुत बेहतर नहीं है। कहने के लिए बनारस प्रधानमंत्री का चुनाव क्षेत्र है, पर बड़े पैमाने पर वहां सड़क और पुल निर्माण कार्यों के चलते उड़ती धूल और गाड़ियों से निकलते धुएं के कारण सड़कों पर चलना दूभर है। वहां की स्थिति किसी भी तरह दिल्ली की स्थिति से अच्छी नहीं थी।

पर्यावरण प्रदूषण के लिए किसानों द्वारा जलाई जा रही पराली को ही दोष देना किसानों के साथ अन्याय है। हालांकि कुल प्रदूषण में उसका योगदान चौसठ प्रतिशत है, जिसे देखकर ही शायद उच्चतम न्यायालय ने किसानों को प्रति एकड़ सौ रुपए के हिसाब से भुगतान करने के लिए सरकार को आदेश दिया, जिससे कि वे पराली जलाने का विकल्प अपना सकें। शहरों में तीव्र गति से फैल रहे प्रदूषण को रोकने के लिए उनमें चलने वाले गाड़ी के गैरेज, निर्माण कार्यों, सड़क के किनारे लगने वाले बाजारों पर भी नियंत्रण रखने की सोचनी चाहिए। यत्र-तत्र चौराहों पर होने वाले यातायात जाम भी प्रदूषण में कम योगदान नहीं देते, यह ध्यान देने की बात है।

’राजेंद्र प्रसाद सिंह, पश्चिमी विनोद नगर, दिल्ली

नीचे की ओर

सकल घरेलू उत्पाद की दर लगातार नीचे की ओर लुढ़क रही है। लोग बढ़ती महंगाई से परेशान हैं। रोजमर्रा के उपयोग की वस्तुओं के दाम आसमान छू रहे हैं। युवा बेरोजगार हो रहे हैं, मंदी के बादल छाने लगे हैं। कोई पूछने वाला नहीं है कि सकल घरेलू उत्पाद दर दिन-ब-दिन क्यों नीचे गिर रही है? जिस देश में फसलों का उचित मूल्य न मिल पाता हो उसके किसान को दस खरब की अर्थव्यवस्था से भला क्या मतलब; उन नौजवानों के लिए भला क्या मतलब जिन्हें अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए काम न मिल पाता हो? जब लोग बाजार में आलू-प्याज-सब्जी खरीदने निकलते हैं तो मानो कोई जंग लड़ने निकलते हैं। लेकिन सरकार उनकी समस्याओं को हल करने के लिए कोई कदम उठाती नहीं दिख रही है।

’दिनेश चौधरी, सुरजापुर, सुपौल, बिहार

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