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चौपाल: मौत के बोरवेल

चार दिन तक प्रशासन उसे बचाने में जुटा रहा लेकिन अंत में विफलता हाथ लगी। इन मासूमों की मौत का जिम्मेदार कौन है? आखिर बोरवल खुले छोड़ने वालों पर सख्त कार्रवाई करके ऐसी घटनाओं पर लगाम क्यों नहीं लगाई जा रही है?

Author Published on: June 14, 2019 1:25 AM
109 घंटे बाद बोरवेल से निकाला गया फतेहवीर, लेकिन नहीं बची जान। फोटो सोर्स: इंडियन एक्सप्रेस

हमारे देश में बोरवेल में बच्चों के गिरने की घटनाएं थम नहीं रही हैं। कई साल पहले प्रिंस नाम का बच्चा बोरवेल में गिर गया था जिसे बचा लिया गया था मगर तब से अनेक मासूम बोरवेल में गिर कर जान गंवा चुके हैं। ताजा घटना पंजाब के संगरूर में हुई है जहां दो साल का बच्चा खेलते-खेलते बोरवेल में जा गिरा। चार दिन तक प्रशासन उसे बचाने में जुटा रहा लेकिन अंत में विफलता हाथ लगी। इन मासूमों की मौत का जिम्मेदार कौन है? आखिर बोरवल खुले छोड़ने वालों पर सख्त कार्रवाई करके ऐसी घटनाओं पर लगाम क्यों नहीं लगाई जा रही है?
’बृजेश श्रीवास्तव, गाजियाबाद

त्वरित न्याय
दुष्कर्म के मामलों में अव्वल रहने वाला मध्यप्रदेश अब दुष्कर्म पीड़िताओं को त्वरित न्याय दिलाने में आगे दिखाई दे रहा है। प्रदेश में पिछले साल दुष्कर्म के चौदह मामलों में जिला न्यायालयों ने दुष्कर्मियों को फांसी की सजा सुनाई थी। मंदसौर में आठ वर्षीय बच्ची के साथ दुष्कर्म और हत्या के जघन्य मामले में पुलिस ने वारदात के 42वें दिन चालान पेश कर दिया और अदालत ने 15 दिन के भीतर सजा सुना दी। जब मध्यप्रदेश में के तीन माह भीतर चौदह मामलों में दुष्कर्मियों को सजा सुनाई जा सकती है, तो अन्य राज्यों में ऐसा संभव क्यों नहीं हो पा रहा है? कटनी में तो इसी तरह के मामले में तेरह दिन के अंदर सभी कानूनी प्रक्रियाएं पूरी करके आठ दिन के भीतर चालान पेश कर दिया गया और अदालत ने लगातार पांच दिन सुनवाई करके पीड़िता को त्वरित न्याय दिलाकर इतिहास रचने का काम किया था। इसलिए सरकार को समझ लेना चाहिए कि यौन हिंसा तभी रुकेगी जब क्रूरता का माकूल जवाब दिया जाएगा।
’रितेश कुमार उपाध्याय, संत कबीर नगर

प्यार के दुश्मन
किशोरावस्था में विपरीत-लिंग के प्रति आकर्षण सामान्य व्यवहार है। अक्सर किशोर इसे प्रेम समझने की भूल कर बैठते हैं। ऐसे आकर्षण को कुछ युवक सच्चा प्रेम मानकर युवतियों से भी उसी प्रकार के प्रेम की प्रतिक्रिया की अपेक्षा करने लगते हैं और अपना प्रस्ताव रख देते हैं। ज्यादातर मामलों में लड़कियां प्रस्ताव ठुकरा देती हैं। यह स्वाभाविक भी है। प्रेम इकतरफा नहीं बल्कि दोनों ओर से अभिव्यक्त होने वाली भावना है। इस तथ्य को न समझने वाले ज्यादातर लड़के अपना प्रस्ताव ठुकराए जाने से आहत हो जाते हैं। वे इसे अपना अपमान समझते हैं और उसका बदला लेने पर उतारू हो जाते हैं। नतीजतन, तेजाब डाल देने, जलाकर मारने या फिर किसी दूसरे तरीके से उस लड़की को आहत करने का फैसला कर बैठते हैं। वे इसे ‘सबक सिखाना’ कहते हैं।
अगर इसी का नाम प्यार है तो फिर प्रेम की परिभाषा गहरे संकट में हैं। ऐसे लोग लड़कियों को उपभोग की वस्तु समझते हैं। वे ‘मेरी नहीं तो किसी की नहीं’ जैसी बर्बर सोच से फैसले करते हैं। ऐसे लोगों से प्रेम और प्रेमियों दोनों को ही खतरा है। ये लोग उतने ही खतरनाक हैं जितने कि ‘आॅनर किलिंग’ करने वाले कथित सम्मान के रक्षक!
’मोहम्मद आसिफ, जामिया मिल्लिया इस्लामिया

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