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चौपाल: नई उम्मीदें

मूल्यों के ह्रास का स्तर इतना नीचे चला गया कि चुनाव संपन्न कराने वाली संवैधानिक संस्था चुनाव आयोग भी संदेह के घेरे में आ गई। आयोग पर अप्रत्यक्ष रूप से भाजपा की मदद करने का आरोप भी लगा।

Author Published on: May 25, 2019 4:35 AM
दूसरी बार पीए बनने को तैयार नरेंद्र मोदी

आखिरकार ढाई महीने से चल रहे विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के चुनावी महापर्व का समापन हो गया। इसमें भारतीय जनता पार्टी ने लगातार दूसरी बार जबर्दस्त बहुमत हासिल किया। इस जीत के मायने भाजपा के लिए 2014 में मिली जीत की तुलना में कहीं ज्यादा हैं। 2014 में भाजपा को मिले बहुमत को अक्सर आलोचकों द्वारा यह कह कर खारिज किया जाता रहा है कि वह तत्कालीन मनमोहन सरकार के खिलाफ व्यापक स्तर पर आमजन में मौजूद एंटी-इनकंबेसी (सत्ता विरोधी रुझान) का प्रतीक था। लेकिन भाजपा को 2019 की यह विजय गठजोड़, राष्ट्रवाद, नोटबंदी और जीएसटी के बीच मिली है जिससे इसका महत्त्व बढ़ जाता है। वहीं दूसरी ओर इससे ‘चौकीदार चोर है’ और ‘मोदी हटाओ, देश बचाओ’ जैसे नारों से सत्ता में आने का ख्वाब देख रही विपक्षी पार्टियों को करारा झटका लगा है।

दलवार दृष्टि से यह चुनाव वामपंथी दलों के राष्ट्रीय राजनीतिक पटल से गायब होने और इलाकाई क्षत्रपों की राजनीतिक भूमिका में कमी आने का भी गवाह रहा जो कि आगामी राजनीतिक परिवर्तन का संकेत है। यह चुनाव केवल राजनीतिक हलचल नहीं बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों के पतन के लिए भी याद रखा जाएगा। अब तक दलों द्वारा परस्पर छींटाकशी करना आम बात रही है, लेकिन इस चुनाव में आपत्तिजनक और शर्मनाक निजी हमलों की संख्या में बहुत बढ़ोतरी हुई। मूल्यों के ह्रास का स्तर इतना नीचे चला गया कि चुनाव संपन्न कराने वाली संवैधानिक संस्था चुनाव आयोग भी संदेह के घेरे में आ गई। आयोग पर अप्रत्यक्ष रूप से भाजपा की मदद करने का आरोप भी लगा। आयोग की भूमिका एवं कार्यप्रणाली (विशेषकर चुनाव के दौरान) को लेकर दो राय हो सकती हैं लेकिन अभी तक ऐसे कोई सबूत नहीं मिले हैं जिससे उसकी भूमिका को लेकर पुख्ता शक किया जा सके।

सवाल है कि अब आगे क्या? बेशक पराजित दल तरह-तरह के बहाने बनाएंगे और ‘आत्मचिंतन और आत्ममंथन’ जैसी कभी न होने वाली ‘वैचारिक-विमर्श प्रक्रिया’ का हवाला भी देंगे। लेकिन दलों में आतंरिक लोकतंत्र के अभाव के चलते ये शब्द केवल टीवी पर प्रवक्ताओं द्वारा हार के कारण पूछे जाने पर ही अस्तित्व में हैं। असल में संगठनात्मक ढांचे में मजबूती के चलते ही कोई भी दल कम से कम धरातल पर अच्छे ढंग से काम कर सकता है।

दूसरी ओर मतदाताओं ने भारी संख्या में भाजपा को वोट देकर उसके कंधों पर देश के सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक विकास की जिम्मेदारी एक बार फिर डाल दी है। मतदाताओं ने जाति या धर्म से ऊपर उठ कर एकतरफा भाजपा की झोली में वोट डाला है। नई सरकार के कार्यकाल में ही देश राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 150वीं जयंती और स्वतंत्रता की 75वीं वर्षगांठ मनाएगा और हम सब उम्मीद करते हैं कि नई सरकार भारतीय इतिहास की इन दो महत्त्वपूर्ण घटनाओं को ध्यान में रख कर देश के विकास के लिए प्रतिबद्ध होकर कार्य करेगी।
’केशव शर्मा, राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर

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