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चौपाल: पराली के पीछे व ध्रुवीकरण से दूर

यह न केवल भारत के ‘वसुधैव कुटुंबकम’ आदर्श के विपरीत है बल्कि देश की समरसता को भी खतरा है।

Author Updated: October 19, 2019 2:13 AM
जिसने इस मामले को फौरी निगाहों से ही देखा होगा वह भी जनता होगा कि यह लड़ाई 2.77 एकड़ जमीन को लेकर है।

धान की फसल काटने के बाद खेतों में बचने वाली पराली को संभालने के संसाधन व मशीनरी महंगी होने के कारण किसान पराली जलाने को मजबूर हो चुके हैं। इस सीजन के दौरान भी पंजाब के किसान पराली को आग ही लगा रहे हैं जिससे न सिर्फ पर्यावरण बुरी तरह प्रभावित हो रहा है बल्कि खेतों की उपजाऊ शक्ति भी नष्ट हो रही है। पंजाब के ज्यादातर किसानों की तरफ से धान की दो किस्मों पूसा-44 व पीआर-118 समेत बासमती की बिजाई की जाती है और इन किस्मों के ज्यादा समय लेने की वजह से इनकी फसल अक्तूबर माह में बड़ी मुश्किल से तैयार हो पाती है।

अक्तूबर के ही चौथे सप्ताह में गेहूं की बिजाई का समय शुरू हो जाता है। ऐसे हालात में किसान धान की पराली की चौपर से कटाई करने के बाद उसे आग लगा देते हैं जिससे उनका समय व पैसा दोनों बच जाते हैं। हालांकि पंजाब के खेतीबाड़ी विभाग की तरफ से पिछले कई सालों से किसानों को पराली को जलाए बिना ही हैपीसीडर, जीरो ट्रिल ड्रिल, चौपर कम सलेंडर व पैडीबेलर के जरिए गेंहू की बिजाई करने की सलाह दी जाती है लेकिन यह सारी मशीनरी काफी महंगी होने के कारण पंजाब के ज्यादातर किसानों के पास उपलब्ध नहीं है।

इसके अलावा विलुप्त हो रही संयुक्त परिवार परंपरा के कारण ज्यादातर किसानों के पास काफी कम जमीन है और वे ऐसी महंगी मशीनरी खरीदना तो दूर, उसे किराये पर लेने की भी क्षमता नहीं रखते। यदि किसान पराली को आग न लगाए तो उसे कम से कम 25 सौ रुपए प्रति एकड़ अतिरिक्त खर्च करना पड़ेगा और खेतीबाड़ी का धंधा लाभदायक नहीं रहने की वजह से वह पैसा खर्च करने को तैयार नहीं है।

’राजीव शर्मा, कोटकपूरा, पंजाब

ध्रुवीकरण से दूर

सन 1986 से निरंतर चर्चा में बने रहने वाले राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद की सुनवाई आखिरकर उच्चतम न्यायालय ने पूरी कर दी है। सभी पक्षों की लिखित दलीलें मिलने के बाद पांच जजों का संविधान पीठ फैसला सुनाएगा। जिसने इस मामले को फौरी निगाहों से ही देखा होगा वह भी जनता होगा कि यह लड़ाई 2.77 एकड़ जमीन को लेकर है। इस मसले को देखकर प्रेमचंद के उपन्यास ‘रंगभूमि’ का पात्र सूरदास याद आ जाता है जो अपनी जमीन के टुकड़े को नहीं बेचना चाहता क्योंकि वह उसकी पैतृक संपत्ति है और उससे वह भावनात्मक रूप से जुड़ा हुआ है। कुछ ऐसी ही स्थिति अयोध्या विवाद की है; एक जमीन का टुकड़ा है और ढेर सारी भावनाएं हैं!

लेकिन यह जमीन का टुकड़ा और भावनाएं एक और जगह भी होती हैं वे हैं हमारे गांव। हमारे गांवों में अक्सर देखा जाता था कि एक समाज के लोग जमीन दान कर दूसरे समाज के लोगों को गांव में लेकर आते थे भले ही यह प्रक्रिया वर्ण-व्यवस्था से प्रेरित थी लेकिन यह सामाजिक सद्भाव और विविधता को बढ़ाने वाली थी। यही हमारे भारत का स्वभाव रहा है जबकि अयोध्या मामला अलग ही दिखाई देता है।

यह न केवल भारत के ‘वसुधैव कुटुंबकम’ आदर्श के विपरीत है बल्कि देश की समरसता को भी खतरा है। इसके अलावा यह मामला भावनाओं से कम, राजनीतिक ध्रुवीकरण से जुड़ा ज्यादा प्रतीत होता है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट का फैसला चाहे जो हो इसे अवांछनीय ध्रुवीकरण से बचाना होगा और हमारी ग्रामीण संस्कृति की लाज रखनी होगी।

’सचिन, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय

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