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चौपाल: बदहाल विश्वविद्यालय व प्लास्टिक में उलझी जिंदगी

एक बार इस्तेमाल होने वाला यानी सिंगल यूज प्लास्टिक की व्याख्या से पुलिसिया खौफ तक लोगों को सता रहा है।

Author Published on: September 18, 2019 6:19 AM
सांकेतिक तस्वीर।

बिहार के ज्यादातर विश्वविद्यालय अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहे हैं। इस वजह से आज राज्य के लिए शैक्षणिक पिछड़ापन सबसे बड़ी समस्या है। सरकार परंपरागत के साथ व्यवसायिक पाठ्यक्रमों को बढ़ावा तो दे रही है, पर शिक्षा के प्रति राज्य सरकार की उदासीनता और लापरवाही नौजवानों के भविष्य पर भारी पड़ रही है। हालत यह है कि उचित शिक्षा नीति का अभाव, शिक्षकों की नियुक्ति में देरी और अराजकता के माहौल ने पूरी शिक्षा व्यवस्था को चौपट कर डाला है। राजभवन में होने वाली बैठकों में परीक्षा, परिणाम और वर्ग संचालन पर निर्देश जारी होता है, पर योग्य शिक्षकों की नियुक्ति, शिक्षकों के स्वतंत्र शिक्षण कार्य जैसे मसलों पर सभी मौन हो जाते हैं।

राज्य में हर साल लाखों नौजवान अपना भविष्य संवारने कॉलेजों में आते हैं, पर वहां योग्य शिक्षकों की घोर कमी और समुचित व्यवस्था का अभाव उनको खुद के साथ छल होने का अहसास कराता है। योग्य शिक्षक नहीं मिलने की वजह से उच्च शिक्षा के लिए छात्र राज्य से बाहर जाने को मजबूर होते हैं। यह शर्म की बात है। बदहाली का आलम यह है कि विश्वविद्यालय और कॉलेजों के लिए शिक्षकों के सृजित पदों में भी लगभग पैंसठ फीसद पद खाली हैं। यह स्थिति तब है जब हाल में बिहार लोक सेवा आयोग सहायक शिक्षकों की नियुक्ति कर चुका है।

’संत जी, पटना विवि, पटना

प्लास्टिक में उलझी जिंदगी

प्लास्टिक की खोज निश्चित रूप से एक बड़ी उपलब्धि रही है। प्लास्टिक ने जिंदगी के हर क्षेत्र को प्रभावित किया है। सबसे ज्यादा तो घरों में रोजमर्रा की जरूरतों में इस्तेमाल होने वाली प्लास्टिक थैलियां समस्या बन गई हैं। प्लास्टिक की रोकथाम पर सरकार की सख्ती देख रोजगार सहित प्लास्टिक के विकल्पों को लेकर शोर होने लगा। एक बार इस्तेमाल होने वाला यानी सिंगल यूज प्लास्टिक की व्याख्या से पुलिसिया खौफ तक लोगों को सता रहा है।

सवाल तो यह है कि खुले तेल या कोई तरल खरीदने के लिए जहां प्लास्टिक बोतलें ही आसान विकल्प हों और प्लास्टिक रैपरों में दवाइयां खरीदनी मजबूरी हों तो लोग कहां जाएंगे? निश्चित ही सरकार को इनके विकल्प बताने होंगे। जूट के थैले उतने ही दुर्लभ हैं जितनी प्लास्टिक थैलों की आसान पंहुच है। ऐसे में प्लास्टिक में उलझी जिंदगी विकल्पों की तलाश में जिंदगी मुश्किल बना दे।

’एमके मिश्रा, रातू

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