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चौपाल: सुधार का इंतजार, कुपोषण के विरुद्ध व उपेक्षित बुजुर्ग

वैश्विक पोषण रिपोर्ट 2018 के अनुसार दुनिया में पंद्रह करोड़ से अधिक बच्चे कुपोषण के शिकार हैं।

Author Published on: September 11, 2019 3:17 AM
सांकेतिक तस्वीर।

जन-धन, आधार और मोबाइल यानी जैम, मुफ्त गैस एवं बिजली कनेक्शन, सभी को आवास, किसान सम्मान निधि, मुद्रा और आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं का बिना किसी भेदभाव के सफल क्रियान्वयन देश की आबादी के एक बड़े और गरीब तबके के जीवन स्तर में व्यापक स्तर पर सुधार ला रहा है। हालांकि सुस्ती के भंवर में फंसी अर्थव्यवस्था को उबारने के लिए तत्काल कुछ साहसिक फैसले लेने होंगे ताकि जीडीपी की ऊंची वृद्धि के दौर में दाखिल हुआ जा सके। मौजूदा केंद्र सरकार ने पहले कार्यकाल में जीएसटी, दिवालिया संहिता और रेरा जैसे कुछ प्रमुख संरचनागत सुधार किए। कुछ सुधार अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं। ऐसे सुधार और उनका प्रभावी क्रियान्वयन आने वाले कई दशकों के लिए ऊंची वृद्धि का आधार उपलब्ध करा सकते हैं। वे भारतीयों की आंखों से गरीबी के आंसू पोंछ सकते हैं।

’हेमंत कुमार, गोराडीह, भागलपुर, बिहार

कुपोषण के विरुद्ध

वैश्विक पोषण रिपोर्ट 2018 के अनुसार दुनिया में पंद्रह करोड़ से अधिक बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। भारत में 4 करोड़ 66 लाख बच्चे कुपोषण से ग्रस्त हैं। यह संख्या दुनिया भर में सर्वाधिक है। भारत की जनसंख्या अधिक होने के कारण यहां कुपोषण का स्तर व्यापक है। कुपोषण से निपटने के लिए ढेरों योजनाएं चलाए जाने के बावजूद यदि देश में इतने बच्चे कुपोषित हैं, तो इसकी वजह कहीं न कहीं नीतियों का सही क्रियान्वयन नहीं होना भी है। निस्संदेह, देश में कुपोषण को लेकर जागरूकता की कमी है। इस समस्या को दूर करने के लिए कुपोषित बच्चों की पहचान की जानी चाहिए।

हमारे नीति नियंताओं को देश के विकास संबंधी नीतियां-परियोजनाएं बनाते हुए यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत में गरीबी ही मूलत: कुपोषण की जननी है। इसके मद्देनजर देश के गरीब परिवारों का आय बढ़ाने के उपाय करने के साथ ही उन्हें आर्थिक सहायता भी प्रदान की जानी चाहिए। उन्हें अच्छी तरह से कुपोषण और उसके दुष्परिणामों के प्रति जागरूक किया जाना चाहिए। इसके लिए हमारा मकसद पोलियो मुक्त भारत की तरह ‘कुपोषण मुक्त भारत’ का होना चाहिए।
’सौरभ शर्मा, महासमुंद, छत्तीसगढ़

उपेक्षित बुजुर्ग
दक्षिण दिल्ली की एक संभ्रांत कॉलोनी में रह रहे 91 वर्षीय बुजुर्ग की जिस तरह उनके नौकर ने गला दबा कर हत्या कर दी और फिर लाश को फ्रिज में डाल कर ठिकाने लगाने का प्रयास किया वह न सिर्फ राजधानी में बढ़ते अपराध, बल्कि शहरों में रह रहे बुजुर्गों की असुरक्षा को भी रेखांकित करता है।
बहुत सारे बुजुर्ग अपनी संतानों की उपेक्षा के शिकार हैं। इस वजह से जहां बहुत से लोग वृद्धाश्रम में रहने को मजबूर हैं तो कई घरेलू कामों के सहारे गुजर-बसर करते हैं।

जिन बच्चों को मां-बाप पढ़ा लिखा कर योग्य बनाते हैं, वही बुढ़ापे में उन्हें उनके हाल पर छोड़ देते हैं। यह बहुत अफसोस की बात है और यह धीरे-धीरे गंभीर चिंता का विषय बनता जा रहा है। हाल ही में बिहार सरकार ने एक अहम फैसला लिया है कि माता-पिता की सेवा नहीं करने और उन पर अत्याचार करने वाली संतान के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी। बुजुर्ग माता-पिता का खयाल रखने के मकसद से सरकार का यह फैसला निश्चित रूप से स्वागतयोग्य है। हालांकि अपने आप में यह दुखद है कि बुजुर्ग माता-पिता को अपने ही बच्चों के कारण सुरक्षा लेने के लिए किसी कानून की शरण में जाना पड़े।
’अभिजीत मेहरा, गोड्डा, झारखंड

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