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चौपाल: खुलती गांठें

बसपा के वोट सपा में ट्रांसफर नहीं हुए इसमें कोई दो राय नहीं हैं नहीं तो सीटों की संख्या में इजाफा देखने को अवश्य मिलता। इसके उलट यह आरोप भी अखिलेश के सिर मढ़ दिया गया कि सपा के वोट बसपा में ट्रांसफर नहीं हो पाए।

Author Published on: June 7, 2019 1:03 AM
सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव फोटो सोर्स- फाइनेंसियल एक्सप्रेस

महागठबंधन राजनीतिक दृष्टि से अखिलेश यादव की एक बहुत बड़ी भूल थी। दो विपरीत विचारधाराओं की पार्टियां लंबे समय तक साथ नहीं रह सकतीं यह स्वयंसिद्ध है। यदि देखा जाए तो इस पूरे आम चुनाव में राष्ट्रीय स्तर पर ऐसे दो नेता रहे जिन्होंने अपने आधार पर ध्यान न देकर भद्द पिटवा ली लिहाजा, इसका खमियाजा पार्टी को भुगतना पड़ा। उनमें एक अखिलेश यादव और दूसरे चंद्रबाबू नायडू हैं। बाकी सबको अपने-अपने हिस्से का कुछ न कुछ जरूर मिला। किसी को एक, किसी को दो या किसी को शून्य मिला तो भी उसे पता था कि हम इतने भर के ही थे! लेकिन इन दोनों नेताओं ने तो अपनी करनी से अपने हिस्से का भी गंवा दिया।

मृतप्राय हो चुकी बहुजन समाज पार्टी को कंधा देकर जीवित करने वाली अखिलेश यादव की पार्टी अब स्वयं मरणासन्न अवस्था में आ गई है। बसपा के वोट सपा में ट्रांसफर नहीं हुए इसमें कोई दो राय नहीं हैं नहीं तो सीटों की संख्या में इजाफा देखने को अवश्य मिलता। इसके उलट यह आरोप भी अखिलेश के सिर मढ़ दिया गया कि सपा के वोट बसपा में ट्रांसफर नहीं हो पाए। शून्य सीटों वाली बसपा दहाई अंकों में पहुंचने के बाद यह कह रही है कि वोट नहीं मिला! अखिलेश यादव ने महागठबंधन को बचाने और कुशलता से उसे चलाने के लिए क्या कुछ नहीं किया। इन चुनावों में कई अवसरों पर उन्होंने समझौता किया चाहे वह पार्टी को मिली सीटों की संख्या हो या सामाजिक संदेश देने के लिए मायावती का सम्मान हो। लेकिन फिर भी मायावती की नजरों में चूक अखिलेश की तरफ से ही रही। यह तो तय था कि महागठबंधन से कोई खुश नहीं था लेकिन फिर भी विचारधारा को तिलांजलि देकर दोनों पार्टियां साथ आर्इं जरूर लेकिन ज्यादा दिन तक साथ रह नहीं पार्इं।

बिहार में पहले से ही एक स्थापित उदाहरण होने के बावजूद पार्टियों ने उससे कुछ नहीं सीखा सो अब भुगत रहे हैं। इसके साथ ही भाजपा को यह कहने का मौका भी मिल गया कि महागठबंधन दरअसल ठगबंधन है। इसका फायदा कम बल्कि नुकसान ज्यादा हुआ। आगामी विधानसभा चुनावों में भी इसका असर अवश्य पड़ेगा। उपचुनाव से पहले ही दोनों पार्टियों ने अलग होने का फैसला कर लिया है। पिछले चुनाव में पारिवारिक कलह और अबकी यह गठबंधन अखिलेश यादव के लिए दोनों ही अच्छे नहीं रहे। सपा, बसपा, रालोद, राजद या उनके जैसी अन्य पार्टियों को चुनाव के लिए चले आ रहे अपने पुराने तरीके बदलने की आवश्यकता है।
’सचित्र मिश्र, अकबरपुर, अंबेडकर नगर

नए सिरे से
राजग सरकार इस बार अधिक मजबूती से सत्ता में आई है और उसने अनुच्छेद 370 खत्म करने का वादा किया है। इस अनुच्छेद को खत्म करने अथवा उसकी खामियां दूर करने के उपायों पर काम करते हुए सरकार को यह भी देखना होगा कि कश्मीर के वर्चस्व को कैसे खत्म किया जाए? जम्मू-कश्मीर की समस्या को केवल घाटी की समस्या के तौर पर देखे जाने के अपने दुष्परिणाम सामने आए हैं। इसलिए जम्मू और लद्दाख की अनदेखी ही होती है। एक समस्या यह भी है कि कश्मीर की हर छोटी-बड़ी घटना को सदैव गंभीर चुनौती के तौर पर देखा जाता है। इसके चलते वहां अलगाववाद ने एक धंधे का रूप ले लिया है। जम्मू-कश्मीर में नए सिरे से परिसीमन की तैयारियों के पीछे का सच जो भी हो, उपद्रवग्रस्त घाटी को पटरी पर लाने के लिए हरसंभव कदम उठाने का समय आ गया है।
’हेमंत कुमार, गोराडीह, भागलपुर, बिहार

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