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चौपाल: दरिंदगी के विरुद्ध

आपको लग रहा होगा कि यह एक अतिवादी स्थापना है। लेकिन यह स्थापना उसी संकुचित सोच की अनिवार्य तार्किक परिणति है जिसके तहत हम ऐसे घृणित कृत्यों को धर्म या मजहब से जोड़ कर देखने और दिखाने लगते हैं।

Author Published on: June 11, 2019 2:08 AM
(प्रतीकात्मक तस्वीर- इंडियन एक्सप्रेस)

दरिंदगी को अक्सर हम युगों से जोड़ कर नापते हैं। इसे नापेंगे तो हमें मध्ययुग के पीछे उस कालखंड में जाना पड़ेगा जो सभ्यताओं के भी पीछे का आदिम युग कहलाता है। हजारों हजार वर्षों का सफर तय करने के बाद भी दहशत और पशुता का वही चेहरा फिर-फिर हकीकत बन कर सामने आ खड़ा होता है। और तिस पर हम अपने-अपने चश्मे लगा कर इन घृणित और विद्रूप चेहरों को शर्मनाक तरीके से बांटने और छांटने लगते हैं। कुछ चुनी हुई मिसालों को आगे रख कर उस खेमे के लोग इन पर हिंदू सांप्रदायिकता या हिंदू बहुसंख्यकवाद का ठप्पा लगा देते हैं, तो कुछ खास घटनाओं को अलग करके इस खेमे के लोग उछल पड़ते हैं कि देखा, मैंने पहले ही कहा था इस्लाम बर्बरता और वहशत का पर्यायवाची है!

आप देखेंगे तो इस तरह की विडंबना पूर्ण घटनाओं में जबरदस्त ‘सर्वधर्म समन्वय’ दिखाई देगा। कहीं गुजरात दंगे, कहीं निर्भया, कहीं कठुआ तो कहीं अलीगढ़ की दरिंदगी की शिकार बच्चियां नजर आएंगी। सुदूर अतीत में जाने पर विभाजन के वक्त में मासूमों के खून से रंगे सरहदी इलाके दिखाई देंगे। समझ नहीं आता कि इन लोम सिहरक घटनाओं को अंजाम देने के जुनूनी, आदमखोर और हृदयहीन क्षणों में कोई व्यक्ति या समूह किसी मजहब के दर्शन का प्रतिनिधि कैसे हो सकता है? और अगर उसे प्रतिनिधि मान लिया जाए तो इससे क्या यह बात साबित नहीं हो जाती है कि सभी मजहब वहशत को रोकने में बुरी तरह नाकाम हुए हैं? अगर आपके और हमारे दिलों में सभ्य मानव समाज के लिए जरा भी चिंता बाकी है तो हमें आज से ही, बल्कि अभी से तमाम मजहबी ढकोसलों को बंद कर देना चाहिए। ऐसे में कवि कुमार विकल की कुछ पंक्तियां शिद्दत से याद आने लगती हैं- ‘मैं चाहे कृपाण से मरूं या त्रिशूल से/ या किसी भीड़ से/ लेकिन मरने से पहले/ चिल्लाऊंगा जरूर/ कि मजहब ही है सिखाता आपस में बैर रखना!’

आपको लग रहा होगा कि यह एक अतिवादी स्थापना है। लेकिन यह स्थापना उसी संकुचित सोच की अनिवार्य तार्किक परिणति है जिसके तहत हम ऐसे घृणित कृत्यों को धर्म या मजहब से जोड़ कर देखने और दिखाने लगते हैं। या फिर एक दूसरा रास्ता यह बचता है कि ऐसे कृत्यों को धर्म से जोड़ने के बजाय इन्हें मानवता विरोधी कृत्य के तौर पर देखा जाए और सभ्यता के पक्ष में खड़े होकर पुरजोर तरीके से ऐसी बर्बरताओं को एक सुर से खारिज किया जाए!
’राहुल मिश्रा, विकास कॉलोनी, चिरगांव, झांसी

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