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चौपाल: प्रदूषण के विरुद्ध

ध्वनि प्रदूषण को कम करने की दिशा में भी कदम उठाने होंगे। सड़कों के किनारों के दोनों और हरे वृक्ष लगाने से तेज ध्वनि की तीव्रता को कम किया जा सकता है।

पटाखों से होने वाला प्रदूषण कई दिनों तक अपना दुष्प्रभाव दिखाता है।

ध्वनि प्रदूषण और वायु प्रदूषण का बढ़ना चिंताजनक है। यह स्वास्थ्य पर खतरे की संभावना को बढ़ाता है। खराब सड़कों से उड़ रही धूल के कारण हवा में मिल रहे धूल कण और उद्योगों से निकलने वाले हानिकारक सूक्ष्म कण सांस के जरिए फेफड़ों में पहुंच कर गंभीर बीमारियां पैदा करते हैं। चार दिन बाद दीपावली है और पटाखों से होने वाला प्रदूषण कई दिनों तक अपना दुष्प्रभाव दिखाता है। हम चाहें तो दीपावली जैसे त्योहार को प्रदूषण मुक्त रखने का संकल्प ले सकते हैं और इस बार पर्यावरण अनुकूल हरित पटाखे फोड़ें। ज्यादा शोर वाले पटाखों का असर छोटे बच्चों और पशु-पक्षियों पर भी होता है। इसलिए ध्वनि प्रदूषण को कम करने की दिशा में भी कदम उठाने होंगे। सड़कों के किनारों के दोनों और हरे वृक्ष लगाने से तेज ध्वनि की तीव्रता को कम किया जा सकता है।
’संजय वर्मा, मनावर, धार

हकीकत को देखें

पिछले तीन-चार सालों से यही बात गुंजायमान हो रही है कि जो काम पिछले पचास सालों में नहीं हुआ, वह पांच सालों में कर दिखाया। अब समझ में नहीं आता कि जब भी देश में कोई मुद्दा या समस्या उभर कर आती है तो उसके लिए पूर्ववर्ती सरकार को ही जिम्मेदारी ठहरा दिया जाता है। जब पचास सालों में जो विकास या तरक्की हुई ही नहीं, और वह सिर्फ पांच सालों में ही हुई तो फिर पूर्ववर्ती सरकारें दोषी किस बात के लिए हुर्इं? उन पर उंगली क्यों उठाई जाती है! क्या यह अपनी विफलताओं को छिपाने की कोशिश नहीं है? कहते हैं कि गड़े मुर्दे उखाड़ने से कोई लाभ नहीं होता। वर्तमान में देश के समक्ष उभरी समस्याओं का सामना हमें ही करते हुए उसका उचित निदान करना होगा। उदाहरण के लिए इसी खबर को लें कि भुखमरी जैसी समस्या से निपटने में भारत पाकिस्तान और बांग्लादेश से भी पीछे है। जिस पाकिस्तान को हम टीवी चैनलों पर भिखमंगा, भिखारी, फकीर कह कर निंदा कर रहे हैं, अब भुखमरी पर आई वैश्विक रिपोर्ट क्या साबित करती है, यह हमें सोचना चाहिए। हमें जो हकीकत है, उसका सामना करना चाहिए, उससे बचा नहीं जा सकता। आखिर पीतल पर कब तक सोने की परत चढ़ा कर हम झूठ को सच में बदलते रहेंगे?
’हेमा हरि उपाध्याय, खाचरोद, उज्जैन

पुलिस और पहल
हाल में राजस्थान पुलिस की हिरासत से लोगों के भाग निकलने की घटनाएं हों या फिर थर्ड डिग्री के इस्तेमाल से लोगों की मौत के मामले हों, पुलिस प्रमुख ने संज्ञान तो लिया। प्रदेश में पुलिस की छवि और कार्य-संस्कृति में बदलाव लाने की दिशा में पुलिस प्रमुख की यह बड़ा कदम है। पुलिस प्रमुख ने अपने निर्देश में अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिया है कि थर्ड डिग्री के इस्तेमाल के बजाय वैज्ञानिक तरीके पूछताछ और जांच के काम होने चाहिए। महिला अपराधियों के मामले में कहा गया है कि अपवाद की स्थिति में ही किसी महिला मुलजिम को रात में थाने में रखा जाए और महिला अपराधी से पूछताछ के लिए महिला पुलिसकर्मी का होना भी जरूरी है। पुलिस प्रमुख की इस सक्रियता से तो स्पष्ट है कि राजस्थान पुलिस ने मानवाधिकारों को तवज्जो देने का मन बना लिया है और अगर ऐसा वास्तव में है तो यह स्वागतयोग्य कदम है, साथ ही दूसरे राज्यों के पुलिस विभाग को भी अपने राज्यो में ऐसे दिशनिर्देशों जारी करना चाहिए। इससे इतना स्पष्ट है कि पुराने जमाने के पुलिस अधिनियम में संशोधन की जरूरत है।
’केशव प्रताप सिंह, बांदा

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