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चौपाल: संवेदना के विरुद्ध, बयान का निहितार्थ व दुरुस्त आयद

शायद प्रतिदिन मिलने वाली हत्या, बलात्कार, लूटपाट, भ्रष्टाचार आदि की खबरों ने हमारी संवेदना को इनका अभ्यस्त बना दिया है।

सांकेतिक तस्वीर।

आज हम एक वैश्विक ग्राम में रह रहे हैं जहां प्रौद्योगिकी के जरिए पलक झपकते ही सूचनाओं का आदान-प्रदान हो रहा है। इंटरनेट के जरिए सूचनाएं सर्वसुलभ भी हैं और व्हाटसप, फेसबुक आदि की पहुंच सुदूर देहात तक हो गई है। लेकिन अफसोस की बात है कि इन सूचनाओं का असर मानवीय संवेदना पर पहले जैसा नहीं दिखाई देता है। शायद प्रतिदिन मिलने वाली हत्या, बलात्कार, लूटपाट, भ्रष्टाचार आदि की खबरों ने हमारी संवेदना को इनका अभ्यस्त बना दिया है। इसीलिए ये तमाम अपराध या घटनाएं हमें सामान्य लगने लगती हैं। दूसरी तरफ तमाम सूचना माध्यमों का नियंत्रण कारपोरेट व सरकारों के हाथ में है जो इनका प्रयोग इटैलियन लेखक ग्राम्शी के शब्दों में ‘सांस्कृतिक प्रभुत्व’ के लिए करते हैं।

अर्थात सामाजिक-आर्थिक संरचना में शक्तिशाली वर्गों के हित में सांस्कृतिक प्रचार-प्रसार करना ताकि उनका प्रभुत्व बना रहे। यही वजह है कि टीवी मीडिया में ज्ञानवर्धक व वैज्ञानिक चेतना पैदा करने वाले कार्यक्रमों के बजाय सांप्रदायिक बहस-मुबाहिसे और अंधविश्वास के कार्यक्रमों की भरमार रहती है। इससे समाज की प्रगति प्रभावित होती है। गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी और कुपोषण जैसे जरूरी मुद्दों से जनता का ध्यान हटता है। इससे सत्ता में भागीदार लोगों को लाभ मिल जाता है और उन्हें इन मुद्दों से जुड़े सवालों का जवाब नहीं देना पड़ता। लेकिन हमें एक राह तो निकालनी ही पड़ेगी जहां सूचना प्रौद्योगिकी का प्रयोग मनुष्यता के बेहतरी के लिए किया जाए न कि सांस्कृतिक प्रभुत्व और संवेदनाएं खत्म करने के लिए।

’नीतीश कुमार, बीएचयू, वाराणसी

बयान का निहितार्थ

जब देश के विदेश मंत्री बाकायदा पत्रकार वार्ता में यह कहें कि जल्द ही पाक अधिकृत कश्मीर पर भी भारत का शासन होगा तो इसे हल्के से नहीं लिया जा सकता। लगभग इसी तरह के बयान हमारे गृहमंत्री और रक्षा मंत्री भी दे चुके हैं। अगर इन सब बयानों को समग्र परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो यह पाक अधिकृत कश्मीर के संबंध में सरकार की दृढ़ इच्छाशक्ति और भारतीय सेना की राष्ट्रभक्ति तथा पराक्रम को सीधे-सीधे इंगित करता है।

’रमेश माहेश्वरी, सुल्तानपुर, उत्तर प्रदेश

दुरुस्त आयद

देश में ई-सिगरेट के सेवन और भंडारण समेत हर तरह के कारोबार पर तुरंत प्रभाव से पाबंदी लगा देना सरकार का देरी से उठाया गया दुरुस्त कदम है। ई-सिगरेट एक तरह का इलेक्ट्रॉनिक इन्हेलर होता है जिसमें निकोटिन और रसायनयुक्त द्रव भरा जाता है। चीन में 2003 में इसे यह सोच कर बनाया गया था कि बिना टार या कार्बन के फेफड़ों तक कम मात्रा में निकोटिन जाएगा। लेकिन व्यावसायिक फायदे के लिए ऐसे तरीके अपनाए गए जिनसे अधिक मात्रा में निकोटिन फेफड़ों में जाने लगा। ज्यादातर ई-सिगरेट में द्रव निकोटिन भरा जाता है। इससे पीने वाले को लत लग जाती है। निकोटिन दिल और सांस के मरीजों के लिए बिल्कुल सुरक्षित नहीं माना जा सकता। इसी तरह हुक्का बार में स्वादयुक्त द्रव होता है जिसका लगातार सेवन शरीर की बैक्टीरिया रोधी प्रणाली को क्षतिग्रस्त कर देता है।

भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद ने मई में इलेक्ट्रॉनिक निकोटिन डिलीवरी सिस्टम्स (ईएनडीएस) पर पूर्णत: रोक लगाते हुए कहा था कि इस तरह के उपकरण धूम्रपान और निकोटिन की लत का कारण बनते हैं। इस रोक के बावजूद ई-सिगरेट आदि का इस्तेमाल कम नहीं हो रहा था। प्रतिबंधित होने के बावजूद चोरी छिपे ई-सिगरेट का इस्तेमाल जारी रहने की आशंका है लिहाजा, इसके स्वास्थ्य पर घातक प्रभावों का व्यापक प्रचार भी किया जाना चाहिए।

’फरदीन खान, उज्जैन, मध्यप्रदेश

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