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चौपाल: संस्कृत की उपेक्षा

बाजारवाद हम पर हावी हो चुका है जो हमे संरक्षण के स्थान पर उपभोग को तवज्जो देता है। यही मूल वजह है कि वर्तमान में हमारी परंपरागत भाषाओं पर अन्य भाषाएं हावी होती जा रही हैं और लोग उन्हें तव्वजो भी दे रहे हैं।

Author June 26, 2019 1:33 AM
सात दशक बाद भी सरकार द्वारा संस्कृत को कोई प्रोत्साहन नहीं दिया गया।

हाल में नई शिक्षा नीति के मसौदे में तीन भाषा फॉर्मूले के अंतर्गत हिंदी भाषा को अनिवार्य बनाने पर दक्षिणी राज्यों समेत अन्य जगह पर जिस प्रकार विरोध हुआ और सरकार को हिंदी अनिवार्य न करने का आश्वासन देना पड़ा, ठीक उसी प्रकार सीबीएसई ने अगस्त 2014 में हफ्ते भर तक सभी स्कूलों में संस्कृत सप्ताह मनाने और संस्कृत भाषा से बच्चों को रूबरू कराने को कहा था। इस पर भी काफी विवाद हुआ था और कई राजनीतिक दलों ने तो इसे कट्टरपंथ तक कह डाला था। इससे यह पता चलता है कि हमारा वर्तमान समाज इस अनुरूप ढल चुका है कि हम सुधारात्मक प्रक्रिया में नहीं, बल्कि निजी हित और क्षणिक लाभ में विश्वास करने लगे हैं। सामुदायिक सोच का दायरा सिमट चुका है।

वैश्वीकरण के आधुनिक प्रगतिशील समय में बाजारवाद हम पर हावी हो चुका है जो हमे संरक्षण के स्थान पर उपभोग को तवज्जो देता है। यही मूल वजह है कि वर्तमान में हमारी परंपरागत भाषाओं पर अन्य भाषाएं हावी होती जा रही हैं और लोग उन्हें तव्वजो भी दे रहे हैं। वर्तमान समय में संस्कृत भाषा के प्रति भारतीय छात्रों के मन में हीन भावना और ‘अनुपयोगी’ भाषा की छवि बन चुकी है। बेहतर कैरियर और अवसर के अभाव की भावना के कारण वे इस भाषा से विमुख होते जा रहे हैं। स्कूलों में भी संस्कृत भाषा पढ़ाने पर बिल्कुल भी पहल नहीं की जा रही है। आज देश के चौदह प्रमुख संस्कृत विश्वविद्यालयों की हालत बदतर है। उनमें पैसे की कमी के साथ साथ आवश्यक सुविधाएं, शिक्षकों और छात्रों का अभाव है।

इन सारी कमियों के पीछे बुनियादी कारण यह है कि आजादी के सात दशक बाद भी सरकार द्वारा संस्कृत को कोई प्रोत्साहन नहीं दिया गया। संस्कृत को रोजगारोन्मुख बनाने के लिए नीति नहीं बनाई गई, आधुनिक शिक्षा प्रणाली से संस्कृत भाषा को जोड़ा नहीं गया, विश्वविद्यालयों में पैसे की कमी से शिक्षक नहीं हैं, प्राथमिक स्तर पर स्कूली शिक्षा में संस्कृत को अध्ययन की भाषा के रूप में बढ़ावा नहीं दिया और अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में भी संस्कृत को अनिवार्य नहीं किया गया। हमें समझना चाहिए कि संस्कृत वैज्ञानिक भाषा ही नहीं, बल्कि विचार, संस्कृति और भारतीय संस्कार है जिसमे विश्व-कल्याण, शांति-सहयोग, एकता, समरसता, बंधुत्व और वसुधैव कुटुंबकम की भावना निहित हैं। बाबा साहब भीमराव आंबेडकर ने कहा था कि संस्कृत ही पूरे भारत को भाषाई एकता में बांध सकती है।
’शिवांशु राय, दिल्ली विश्वविद्यालय

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