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चौपाल: भीड़ की हिंसा

भारत एक ऐसा पंथनिरपेक्ष देश है जो हिंदू, जैन, बौद्ध जैसे धर्मों का उद्गम स्थल रहा है और यहां की संस्कृति सभी धर्मों को सम्मान भी देती है। परंतु कुछ संकीर्ण सोच के लोग इसकी छवि को धूमिल करने में लगे हैं जो चिंताजनक और शर्मनाक है।

Author June 26, 2019 1:49 AM
झारखंड में चोरी के रोप में मुस्लिम युवक को पीट-पीटकर मार डाला गया। (फोटो सोर्स: ट्विटर/वायर वीडियो)

किसी न किसी आरोप की आड़ में देश में भीड़ द्वारा हत्या की घटनाएं निरंतर बढ़ती जा रही हैं। आश्चर्य है कि लोगों में कानून का जरा भी भय नहीं रह गया है, बल्कि उसका वीडियो बना कर सोशल मीडिया पर डाल देते हैं। पीड़ित को धर्म विशेष के नारे लगाने पर विवश किया जाता है। सवाल है कि क्या जबरदस्ती भय के साए में विशेष धार्मिक नारे लगवाने से पीड़ित का अपना धर्म बदल जाता है या फिर वह उस धर्म का अनुयायी हो जाता है। निसंदेह धर्म आस्था से जुड़ा होता है और उसे किसी पर जबरदस्ती थोपा नहीं जा सकता।

अगर प्रताड़ित कर ऐसा किया जाता है तो कदापि उचित नहीं है। सभ्य समाज इसे कभी स्वीकार नहीं सकता। संकीर्ण मानसिकता के लोग अपने व्यवहार से जिस दुस्साहस का परिचय दे रहे हैं, स्वयं उनका धर्म ऐसे कृत्यों को घृणित समझता है। भारत एक ऐसा पंथनिरपेक्ष देश है जो हिंदू, जैन, बौद्ध जैसे धर्मों का उद्गम स्थल रहा है और यहां की संस्कृति सभी धर्मों को सम्मान भी देती है। परंतु कुछ संकीर्ण सोच के लोग इसकी छवि को धूमिल करने में लगे हैं जो चिंताजनक और शर्मनाक है। देश व प्रदेश की सरकारों को ऐसे मामलों में कठोर कदम उठाने चाहिए। समाज को भी ऐसे लोगों का बहिष्कार करना होगा जो सामाजिक तानेबाने को कमजोर करने पर तुले हैं।
’मंजर आलम, रामपुर डेहरू, मधेपुरा

अवसरवाद का रोग
हरियाणा में दलबदल की राजनीति तेज हो गई है। बेहतर छवि वाले भाजपा विरोधियों को शामिल करने की मुहिम चलाई जा रही है। प्रश्न यह नहीं है कि दलबदल होना या नहीं होना चाहिए? प्रश्न यह है कि आखिर दलबदल कितना लोकतंत्रिक है? ज्यादातर यह देखने में आया है कि सत्ता सुख पाने के इरादे से ही अवसरवादी दलबदल करते रहे हैं, फिर चाहे स्थानीय संस्थाएं हों या विधानसभाएं अथवा लोकसभा और राज्यसभा। बड़ी पार्टियां सत्ता के लिए बहुमत लाने अथवा बहुमत को मजबूत बनाने के लिए दलबदल का खेल खेलती रहती हैं।

वास्तव में देखा जाए तो दलबदल को लोकतांत्रिक तो नहीं कह सकते। हां, इसे अवसरवादी अवश्य कहा जा सकता है, जिसमें व्यक्तिगत और संस्थागत दोनों स्वार्थ साफ-साफ जुड़े नजर आते हैं। अनेक बार दलबदल कानून लाने के लिए आवाजें उठी हैं, किंतु स्वार्थ की राजनीति के चलते और अवसरवादी भावना के मद्देनजर यह आवाज ठंडे बस्ते में ही चली गई। देखा जाए तो दलबदल लोकतंत्र के लिए ठीक नही है और न ही लाभकारी। अवसरवादियों के लिए भले ही ये फायदेमंद हो। इस पर खुली बहस होना चाहिए और अवसरवादिता के खिलाफ व लोकतंत्र की मजबूती के लिए यह बंद होना चाहिए. क्योंकि मतदाता जिन्हें, जिस पार्टी के लिए और जिस उद्देश्य हेतु चुनते हैं, यह उनके मतों और विचारों के प्रति कुठाराघात ही माना जाना चाहिए।
’महेश नेनावा, इंदौर

प्रदूषित नदियां
आज भारत में प्रदूषण एक बड़ी समस्या बन गई है। नदी जल प्रदूषण भी ऐसी ही गंभीर समस्या है। उद्योगों से निकलने वाला जहरीला जल और रसायन नदियों को ज्यादा प्रदूषित कर रहे हैं। इस दूषित जल की वजह से नदियों के कई जीव-जंतु, पशु-पक्षी और सीधे प्रभावित हो रहे हैं। आज इस दूषित जल को पीने की वजह से कई जानलेवा बीमारियां फैल रही हैं, जैसे- टाइफाइड, पीलिया, पेट से संबंधित अन्य बीमारियां आदि। सबसे बड़ी बात तो यह है कि इस पानी को साफ करने के नाम हर साल करोड़ों रुपए खर्च किए जाते हैं। लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकलता।

गंदे पानी से हर साल देश में सात लाख से ज्यादा लोग मर जाते हैं। विडंबना यह है कि विकसित देशों में प्रदूषित जल व गंदगी से मरने वालों की तादाद एक फीसदी से भी कम है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट की मानें तो पीने के साफ पानी और साफ-सफाई की उचित व्यवस्था करने पर समूची दुनिया में तकरीब सात अरब 34 करोड़ डालर बचाए जा सकते हैं। साथ ही दस अरब डालर की सालाना उत्पादकता बढ़ाई जा सकती है।
’अमित कुमार, दिल्ली विवि

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