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चौपाल: हमारा दायित्व

इन तमाम बातों से निष्कर्ष निकाला जाए तो साफ हो जाता है कि अब हमारे अंदर का इंसान बहुत बदल गया है। उसकी इंसानियत अब जमीन पर नहीं, फेसबुक और ट्विटर पर झलकती है।

इंसान सोशल मीडिया में अधिक संवेदनशील नजर आता है।

मनुष्य ने अपने विकास के क्रम में और कुछ सीखा हो या न सीखा हो पर दोषारोपण करना अवश्य सीख लिया है। हम सफलता का श्रेय खुद रख कर विफलता का ठीकरा दूसरों के सर फोड़ना खूब जान गए हैं और समय के साथ इस कला में पारंगत भी हो गए हैं। हर छोटी-बड़ी घटना, दुर्घटना या परिस्थिति के लिए हम सरकार को दोषी मान कर खुद को बड़ी चालाकी से बचा लेते हैं। गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी, अशिक्षा, हिंसा, जल संकट, बिजली की कमी आदि समस्याओं से निजात दिलाना बेशक सरकार का कर्तव्य है। सरकार की जिम्मेदारी है कि जनता को उसके जीवन से जुड़ी मूलभूत सुविधाएं प्रदान करे। पर हम भूल जाते हैं कि जिस समाज और देश में रहते हैं उसके प्रति हमारी भी कुछ जिम्मेदारियां हैं।

हम अपने अधिकारों के लिए तो जमीन-आसमान एक करने के लिए तैयार रहते हैं, बसों को आग के हवाले करने में देरी नहीं लगाते, रेलवे की पटरियां पलक झपकते उखाड़ देते हैं पर जब कर्तव्यों के निर्वाह की बात आती है तो हमारी हालत पतली हो जाती है। हम लाचार हो जाते हैं, हमारे पास समय का अभाव हो जाता है, संसाधनों की कमी से जूझने लगते हैं। हम किसी दुर्घटना के बाद घायल को उठाने से ज्यादा उसका वीडियो वायरल करने में विश्वास करने लगे हैं। हमें दंगे भड़कते देखकर रोमांच होने लगा है। भविष्य की चिंता किए बिना पेड़ों को काट रहे हैं और गर्मी की छुट्टियों में पहाड़ी इलाकों में सुकून ढूंढ़ रहे हैं। घंटों इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का उपयोग करते हैं बिना यह सोचे कि देश के कितने ही गांवों में आज भी बिजली की किल्लत जस की तस बनी हुई है। हमें पानी बर्बाद करते हुए जरा भी शर्म नहीं आती। शादी-ब्याह में खाना फेंकते हुए हमारे हाथ जरा नहीं कांपते।

इन तमाम बातों से निष्कर्ष निकाला जाए तो साफ हो जाता है कि अब हमारे अंदर का इंसान बहुत बदल गया है। उसकी इंसानियत अब जमीन पर नहीं, फेसबुक और ट्विटर पर झलकती है। वह सोशल मीडिया में अधिक संवेदनशील नजर आता है। हम चाहें तो समाज को बदलने में अपना योगदान दे सकते हैं। पेड़ लगा कर पर्यावरण को सुरक्षित कर सकते हैं, पानी को बेवजह बर्बाद करने से बच सकते हैं, अपने आस-पास सफाई के लिए उचित कदम उठा सकते हैं, धार्मिक सहिष्णुता और भाईचारे को बढ़ावा दे सकते हैं और एक बेहतर समाज का निर्माण कर सकते हैं। अंत में बस एक सवाल- हम चुप रहे तो फिर यह पहल कौन करेगा?
’मुकुल सिंह चौहान, जामिया मिल्लिया, दिल्ली

 

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