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चौपाल: किसका विकास

सूचकांक किसी देश के लोगों के स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा को ध्यान में रखकर बनाया जाता है।

Author नई दिल्ली | Published on: January 23, 2020 1:13 AM
लाखों लोगों के अपनी नौकरियों से हाथ धोने से उनकी क्रयशक्ति बिल्कुल खत्म होकर रह गई है।

‘चिंता की बात’ (संपादकीय, 22 जनवरी) और ‘विषमता का विकास’ (संपादकीय, 22 जनवरी) पढ़ा। किसी भी लोकतांत्रिक और कल्याणकारी राज्य का यह प्रथम दायित्व और अभीष्ट कर्तव्य है कि वह ईमानदारी से अपने राज्य में ऐसी नीतियों को लागू करे, ताकि देश के हर नागरिक को उसे जीवन की मूल आवश्कताओं, जैसे भूख मिटाने को समय पर अन्न, तन ढकने के लिए वस्त्र और सिर छिपाने के लिए एक अदद घर मिल जाए। केवल ‘सबका साथ सबका विकास’ का नारा लगा कर इसके ठीक विपरीत, जनविरोधी नीतियों को अपनाने से पिछले तीन साल में भारत की सत्तर फीसद आबादी की कुल संपत्ति के चार गुने से भी अधिक संपत्ति कुछ शीर्ष धनाढ्यों के पास इकट्ठा हो गया है। दूसरी तरफ इसी देश में लगभग करोड़ों लोग खाने पर संकट झेलते हुए रात में भूख सो जाते हैं। ऐसे विद्रूप विकास पर और अपनी पीठ खुद ही थपथपाने वाले सत्ता के कर्णधारों के इस विकृत सोच को क्या कहा जाए?

कुछ कड़वे तथ्य ‘वर्ल्ड इकॉनोमिक फोरम’ ने स्विट्जरलैंड के दावोस में अपनी ‘ग्लोबल सोशल मोबिलिटी इंडेक्स’ में उजागर किया है। इसके मुताबिक दुनिया के 82 देशों की सूची में भारत का 76 वें स्थान पर होना इसके ‘सबका साथ सबका विकास’ की कथित कहानी की हकीकत का बयान कर देती है। यह सूचकांक किसी देश के लोगों के स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा को ध्यान में रखकर बनाया जाता है। जाहिर है, लगभग हर मामले में भारत की स्थिति अत्यंत शर्मनाक है। लाखों लोगों के अपनी नौकरियों से हाथ धोने से उनकी क्रयशक्ति बिल्कुल खत्म होकर रह गई है, जिससे पूरे देश में आर्थिक मंदी बढ़ती ही जा रही है। स्थिति यह है कि यहां के बाजार सामान से भरे पड़े हैं, लेकिन उनके खरीदार नहीं हैं।

अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारों की पैरोकार संस्था ‘आॅक्सफैम’ की ‘टाइम टू केयर’ नामक रिपोर्ट के अनुसार भारत में 70 प्रतिशत आम जनता की कुल संपत्ति के चार गुना धन नाममात्र के कुछ पूंजीपतियों के पास है। इनके पास कितना धन है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि भारत के एक साल की संपूर्ण बजट से भी ज्यादा इन पूंजीपतियों के पास संपत्ति है। इस विषम स्थिति को देखते हुए कहा जा सकता है लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था का उद्देश्य ही खत्म हो जाता है, जहां चंद पूंजीपतियों के हित को ध्यान में रख कर नीतियां बनाई जाती हैं और देश के 99 प्रतिशत लोगों को,उनके हाल पर छोड़ दिया जाता है।
भारतीय अर्थव्यवस्था में हाल के वर्षों में दुर्गति के बारे में कई वित्तीय संस्थाओं ने भविष्यवाणी की है कि अगले दो सालों में भी भारत की आर्थिक स्थिति सुधरने की गुंजाइश नहीं के बराबर है, क्योंकि दुनिया भर के बड़े निवेशक भारत में अपना पैसा निवेश करने से हिचक रहे हैं। उल्टे वे भारत से अपने निवेशित पूंजी को निकाल कर बाहर के उन देशों में अपना पैसा निवेश कर रहे हैं, जहां का माहौल उनके लिए ठीक है।

आज भारत में एक कहावत कही जा रही है कि ‘हर मर्ज की दवा अदरक ही नहीं हो सकती’, लेकिन भारत के वर्तमान सत्ता के कर्णधार यहां की हर समस्या का, चाहे सरकारी, अर्धसरकारी या सार्वजनिक उपक्रमों का निजीकरण करके उसके समाधान ढूंढ़ने की निर्रथक कोशिश कर रहे हैं। इसका दुष्परिणाम यह हुआ है कि शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों के बेहद मंहगे हो जाने से उसका फायदा केवल एक छोटा धनाढ्य वर्ग ही ले पा रहा है, जबकि,इसी देश में दूसरे गरीब लगभग 70 प्रतिशत लोग शिक्षा से दूर होते जा रहे हैंं और प्राइवेट अस्पतालों में अत्यंत मंहगे हो चुके ईलाज के कारण वे विभिन्न बीमारियों से ग्रसित होकर लाखों की तादाद में असमय मौत के मुंह में चले जा रहे हैं।

’निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद

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