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चौपाल: अमानवीय करतूत

श्रम कानूनों को कमजोर कर निजीकरण को बढ़ावा दिए जाने के इस दौर में असंगठित मजदूरों का शोषण अमानवीय रूप लेता जा रहा है। असंगठित महिला मजदूरों के साथ होने वाले अत्याचारों की दास्तान और भी भयानक है।

Author June 27, 2019 2:19 AM
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है।

महाराष्ट्र के बीड जिले में पिछले तीन साल में साढ़े चार हजार से ज्यादा महिला मजदूरों के गर्भाशय इस कारण निकाल दिए गए कि उनकी माहवारी बंद हो जाए और इस तरह उनके बार बार छुट्टी लेने के कारण गन्ना कटाई का कार्य बाधित न हो। फर्स्ट पोस्ट की 16 जून, 2019 की एक रिपोर्ट बताती है कि 2018 में बीड की जिन दो सौ महिलाओं का सर्वेक्षण किया गया था, उसमें से बहत्तर महिलाओं के गर्भाशय निकाल दिए गए थे। बीड प्रशासन के अनुसार गर्भाशय निकालने के लिए शल्य ग्यारह अस्पतालों में की गई थी और पिछले डेढ़ साल में हुए कुल आॅपरेशनों के पिच्यासी फीसद आॅपेरशन निजी अस्पतालों में हुए।

वैसे बीड जिले के सिविल सर्जन की अध्यक्षता में बनी एक समिति ने इस प्रकरण में निन्यानवे निजी अस्पतालों की संलिप्तता का उल्लेख किया है। समिति के अनुसार जिन महिलाओं का गर्भाशय निकाला गया है उनमें कई महिलाएं ऐसी भी हैं जो गन्ना कटाई के कार्य से संबंधित नहीं हैं। श्रम कानूनों को कमजोर कर निजीकरण को बढ़ावा दिए जाने के इस दौर में असंगठित मजदूरों का शोषण अमानवीय रूप लेता जा रहा है। असंगठित महिला मजदूरों के साथ होने वाले अत्याचारों की दास्तान और भी भयानक है।

पुरुष प्रधान समाज में परिवार के भीतर और बाहर कार्यस्थल में इनके साथ होने वाला भेदभाव यह दर्शाता है कि इन्हें केवल एक साधन के रूप में देखा जा रहा है जिससे मनमाना काम लिया जा सके, मुनाफा कमाया जा सके, किसी मशीन के कलपुर्जों की भांति उसके महत्त्वपूर्ण अंगों के साथ इस प्रकार की छेड़छाड़ की जाए कि वह बिना रुके ज्यादा श्रम कर सके और जब वह अनुपयोगी हो जाए तो उसे अनुपयुक्त घोषित कर खारिज कर दिया जाए। महिला श्रमिकों के शोषण का यह ताजा वाकया महाराष्ट्र में सामने आया है। महिलाओं को रजोधर्म के दौरान अवकाश देने की मांग लंबे समय से की जाती रही है। इस संबंध कुछ याचिकाएं भी लगाई गर्इं, किंतु मामला किसी परिणाम तक नहीं पहुंचा।
’प्रियंबदा, गोरखपुर

 

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