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चौपाल: महंगाई की पीड़ा व चीन का सिरदर्द

सरकार हर साल घाटे का बजट बढ़ा देती है, जिससे कीमतें भी बढ़ जाती हैं। इसका परिणाम यह निकलता है कि रुपए की कीमत घट जाती है।

Author Published on: January 15, 2020 2:38 AM
देश में कई साधारण और जरूरी चीजों की कीमतें आसमान छू रही हैं।

महंगाई एक ऐसा शब्द है जिसकी वजह से देश की अर्थव्यवस्था में उतार-चढ़ाव आते हैं। महंगाई मनुष्य की आजीविका को भी प्रभावित करता है। आजकल समाज में महंगाई और मुद्रास्फीति बहुत ही बड़ी समस्या है। दरअसल, महंगाई हमारे देश के लिए फिलहाल एक बड़ा आर्थिक संकट है। देश में कई साधारण और जरूरी चीजों की कीमतें आसमान छू रही हैं। गरीब लोगों के लिए दो वक्त की रोटी का इंतजाम करना मुश्किल हो जाता है। कभी प्याज का भाव बढ़ गया तो कभी दाल का। समय के साथ महंगाई और भ्रष्टाचार के कारण हालत कुछ ऐसी हो गई है कि अमीर और अमीर होता जा रहा है, गरीब गरीबी के दलदल में और धंस रहा है। देखा जाए तो समाज का हर वर्ग आज मूल्य वृद्धि या महंगाई की समस्या से त्रस्त है, लेकिन निम्न और मध्यम वर्ग के लोग इससे सर्वाधिक प्रभावित होते हैं। महंगाई बढ़ने से लोग अपनी आवश्यकता में कटौती करने लगते हैं।

बढ़ती हुई महंगाई का मुद्रास्फीति के साथ गहरा संबंध है। सरकार हर साल घाटे का बजट बढ़ा देती है, जिससे कीमतें भी बढ़ जाती हैं। इसका परिणाम यह निकलता है कि रुपए की कीमत घट जाती है। महंगाई तो एक तरह से प्रतिदिन की प्रक्रिया बन गई है। वस्तुओं की मांग बढ़ने और निर्माण कम होने के कारण भी महंगाई बढ़ रही है। इसके अलावा, तेजी से बढ़ती जनसंख्या भी एक समस्या है, जिसके मुकाबले संसाधन सीमित हैं। फिर सरकार की अकुशल नीतियां, जिनके चलते खाद्यान्न गोदामों में पड़े सड़ते रहते हैं और जनता भूखे मरती रहती है। कालाबाजारी की वजह से एक तरफ लोगों को अनाज पर्याप्त मात्रा में नहीं मिलते हैं, वहीं बड़े बड़े व्यवसायी अनाज को अपने गोदाम में जमा करके रखते हैं। कालाबाजारी भी एक कारण है, क्योंकि निर्मित वस्तुओं को कम मात्रा में बाजार मे भेजा जाता है, जिसके चलते उसका दाम बढ़ जाता है।

महंगाई को कम करने के लिए उपयोगी आर्थिक नीति की जरूरत है। सरकार को सस्ते दामों पर चीजें उपलब्ध कराना चाहिए और कालाबाजारी व जमाखोरी रोकने आदि के लिए प्रभावी उपाय करने चाहिए। साथ ही किसी भी तरह की आपात स्थिति के लिए बफर स्टॉक बना कर रखना चाहिए, ताकि इससे समय रहते निपटा जा सके।

’अनु मिश्रा, बिठुना, सिवान

चीन का सिरदर्द

हांगकांग चीन के लिए सिरदर्द बना ही हुआ है, अब ताइवान का भी नाम उसमें जुड़ गया गया है। बीते शनिवार को ताइवान में हुए चुनाव में चीन के कट्टर विरोधी नेता सुश्री साई इंग विन ने सत्तावन फीसद वोट प्राप्त करके चीन समर्थक प्रत्याशी को मात देने में सफल हुई। बीजिंग के लिए चिंता का बात यह है कि फिर निर्वाचित राष्ट्रपति चीन एक देश दो नीति वाले फार्मूले को भी नहीं मानतीं। जबकि हांगकांग इसे मानता है। मगर इसकी गारंटी हमेशा हमेशा के लिए चाहता है। तियानानमेन चौक की घटना के बाद चीन बल प्रयोग करने से परहेज कर रहा है। मगर कब तक? ताइवान का अंतराष्ट्रीय संबंध भी कमजोर है। 1971 में ही उसकी संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता छीन ली गई थी। 193 में से केवल 14 छोटे-छोटे देशों के साथ ही उसका राजनयिक संबंध है। ऐसे में यहां के दो करोड़ चालीस लाख लोग कब तक चीन आधिपत्य को अस्वीकार करते रहेंगे?

’जंग बहादुर सिंह, गोलपहाड़ी, जमशेदपुर

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