ताज़ा खबर
 

चौपालः चिंता की दर

बंदी बैंकिंग क्षेत्र को बुरी तरह प्रभावित करेगी। राजकोषीय घाटा भी काफी बढ़ सकता है। ये रिपोर्टें और दावे चिंता बढ़ाने वाले हैं।

Author Published on: April 3, 2020 1:07 AM
यमुना का पानी साठ प्रतिशत तक साफ हो गया है।

कहते हैं जब मुसीबत आती है तो चारों तरफ से आती है। कोरोना लंबे समय तक हमारी अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता रहेगा, ऐसे में आर्थिक विकास की दर कैसे स्थिर रह सकती है? अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रख्यात शोध एजेंसियों के दावे और आईएनजी बैंक की रिपोर्ट के दावे को मानें तो भारत के आर्थिक विकास दर काफी गिर सकती है। बंदी बैंकिंग क्षेत्र को बुरी तरह प्रभावित करेगी। राजकोषीय घाटा भी काफी बढ़ सकता है। ये रिपोर्टें और दावे चिंता बढ़ाने वाले हैं। विकास दर बढ़ाने के तमाम विकल्पों पर अभी से गौर करना होगा, तभी हम संकट से उबर सकेंगे।
-अमृतलाल मारू ‘रवि’, धार, मध्यप्रदेश

क्यों नहीं सोचते
वैश्विक महामारी कोरोना को हराने के लिए हमारे यहां सशक्त कदम उठाए गए हैं। पर इस खामोशी ओर दहश्त भरे माहौल में भी कुछ लोग फर्जी खबरें, खौफनाफ ऑडियो-वीडियो आदि वायरल करने में पीछे नहीं। आखिर क्यों नहीं ये लोग कि वे भी समाज और देश का हिस्सा हैं। दहशत और खौफनाफ माहौल पैदा कर क्या इस माहमारी को रोकने में मदद मिलेगी। ये लोग क्यों नहीं सोचते कि उनकी इस नादानी से कितने लोगों की मानसिकता पर बुरा प्रभाव पड़ेगा? क्यों नहीं सोचते कि कई कमजोर दिल वाले लोग अवसाद का शिकार हो सकते हैं। क्या समाज में रह कर ऐसा भयावह माहौल पैदा करना जरूरी है? नकारात्मक सोच वाले इन लोगों से फिर कैसे राष्ट्रभक्ति की अपेक्षा कर सकते हैं? आज के दौर में आवश्यकता है समाज और देश में नई उर्जा और सकारात्मक संदेशों को एक-दूसरे तक पहुंचाने की। ऊर्जावान, ज्ञानवर्धक, प्रेरणादायी संदेशों की, ताकि वे पीड़ित और प्रभावित वर्ग के लिए संजीवन साबित हों। देश में सकारात्मक योगदान के भागीदार बनें, तभी हमारी संस्कृति, सभ्यता का सही रूप सामने आएगा।
-योगेश जोशी, कंवर कॉलोनी, बड़वाह

भय के बीच
टीबी से लेकर मलेरिया तक ने अपने-अपने वक्त में खौफ और गरीबी के नए-नए अध्याय लिखे हैं। कहते हैं, जिंदगी के रंगमंच से निकली ‘शो मस्ट गो ऑन’ की पीड़ा बुरे हालात पर जीत हासिल करने का हौसला देती है। कोरोना की दहशत ने जहां अमीर देशों को गरीबी के कगार पर खड़ा कर दिया है, वहीं गरीब देशों की गरीबी लोगों को निगलने के लिए बेताब है। जब तक दुनिया इस विषाणु के आतंक का अंदाजा लगा पाती, हम उसकी गिरफ्त में आ चुके थे। अचूक इलाज के तौर पर बंदी और सामाजिक दूरी का सहारा क्या लिया, रोजगार के सारे रास्ते बंद हो गए। भूख की ऐंठन ने गरीबों को पलायन के रास्तों पर ला खड़ा किया। गांव की तरफ बेतहाशा भागती भीड़ को मौत नहीं, भूख का डर सताने लगा। इस भय से सहमे करोड़ों लोगों को बाहर निकालना निश्चित रूप से बड़ी चुनौती है।
-एमके मिश्रा, रातू, रांची, झारखंड

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News AppOnline game में रुचि है तो यहां क्‍लिक कर सकते हैं।

Next Stories
1 चौपालः ठोस पहल की जरूरत
2 चौपाल: जिम्मेदार कौन
3 चौपाल: लापरवाही की हद