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चौपाल: महिला शक्ति, सियासत में शुचिता व नाकामी का रास्ता

राजनीति में नीति को बनाए रखने के लिए इसका शुचितापूर्ण होना आवश्यक है।

Author Published on: February 3, 2020 1:57 AM
दुनिया भर में प्राकृतिक संसाधनों पर पुरुष वर्ग का कब्जा है।

कभी दिल्ली का एक गुमनाम इलाका अब सबकी जुबान पर है। वजह है महिलाएं पिछले कई दिनों से यहां धरने पर बैठी हैं। राजधानी दिल्ली से लेकर पूरे भारत में चर्चा है शाहीन बाग की। हर उम्र और हर तबके की महिलाएं यहां बैठी हैं। पिछले लगभग एक महीने से यही उनका घर है और यही उनका परिवार है। कोई अपने बच्चों के साथ है, तो कोई अपनी तीन पीढ़ियों के साथ। आखिर ऐसी क्या वजह है जिसने इन्हें इतनी सर्द रातों में यहां जमा कर दिया है? ऐसी कौन सी नाराजगी है जिसने इन महिलाओं को एकजुट कर दिया है?नागरिकता संशोधन कानून को लेकर शुरू हुए प्रदर्शन का मोर्चा जब महिलाओं ने संभाला, तो ज्यादा लोगों का ध्यान नहीं गया पर धीरे-धीरे शाहीन बाग में लोगों का कारवां जुड़ता गया और समर्थन मिलता गया। देखते ही देखते पटना, लखनऊ, कोलकाता और अमदाबाद हर जगह औरतें जुटने लगी। इसके बाद कई शहरों में ऐसे मिनी शाहीन-बाग दिखने लगे।

पूरे विश्व में जिस देश में भी अपने हक या सरकार के फैसलों को लेकर आंदोलन हुए हैं, उसमें एक बात आम है और वह यह कि आंदोलनों की अगुवाई महिलाओं के हाथ में रही है। भारत, हांगकांग, इराक, ईरान और सूडान इन सभी देशों में महिलाओं ने आवाज उठानी शुरू की है। लेबनान में महिलाओं ने नारा दिया- ‘रेवोल्यूशन इज वुमन’, यानी क्रांति का दूसरा नाम ही महिला है। इराक और ईरान में सरकार विरोधी प्रदर्शनों में महिलाएं पुरुषों से दो कदम आगे चल रही हैं। इन सब के चेहरे अलग है लेकिन जो बात इन्हें जोड़ रही है, व ह यह कि जहां भी क्रांति की चाह लिए महिलाएं किरदार बदल रही हैं, वहां बदलाव की हवा चल रही है।

’मोहम्मद ताबिश, जामिया, दिल्ली

सियासत में शुचिता

राजनीति में नीति को बनाए रखने के लिए इसका शुचितापूर्ण होना आवश्यक है। इसके लिए यह जरूरी है कि सबसे छोटे स्तर से लेकर देश की संसद तक ईमानदार और बेदाग छवि वाले प्रतिनिधि चुने जाकर पहुंचे। न्यायपालिका, विधायिका और चुनाव आयोग अपने सम्मिलित प्रयासों से राजनीति को अपराध मुक्त बनाने में अपना अहम योगदान दे सकते हैं। जनता का जागरूक और शिक्षित होना भी बहुत आवश्यक है। मतदान को अनिवार्य बना जाकर और आपराधिक पृष्ठभूमि वाले प्रतिनिधियों को पार्टी टिकट से वंचित करके राजनीति को काफी हद तक साफ सुथरा बनाया जा सकता है।
’ललित महालकरी, इंदौर

नाकामी का रास्ता

‘विनिवेश के सहारे’ (संपादकीय, 29 जनवरी) पढ़ा। निजीकरण शब्द जो कुछ वर्ष पहले नकारात्मक और कम प्रचलित था, वह अब धीरे-धीरे घर करने लगा है। पिछले दो-तीन साल से तो इसकी चर्चा काफी बढ़ गई है। कभी रेलवे तो कभी किसी और सार्वजनिक उपक्रम को निजी हाथों में सौंपने की बात होती है, जिससे हर कोई परेशान हो जाता है। अब यह खबर है कि एयर इंडिया का भी निजीकरण होने वाला है। निजीकरण करने के बजाय सरकार अपने उपक्रम को मजबूत करे, कहां कमी है उसे दूर करने का प्रयास करे, अच्छी सुविधाएं प्रदान करे। सही प्रबंधन हो तो ऐसी नौबत नहीं आती। साथ ही कर्मचारियों को भी अच्छे ढंग से अपनी ड्यूटी निभानी होगी, उसे अपना समझ कर काम करना होगा। पांच हजार ट्रिलियन डालर की अर्थव्यवस्था का सपना देखने वाले देश के लिए यह स्थिति कतई अच्छी नहीं कही जा सकती।

’साजिद अली, चंदन नगर, इंदौर

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