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चौपाल: आस्था और पर्यावरण

सरकार द्वारा निर्धारित स्थलों पर ही मूर्तियों के विसर्जन करना चाहिए ताकि नागरिक-सरकार सहयोग से प्राकृतिक स्रोतों को प्रदूषण से बचाया जा सके और अप्रत्यक्ष रूप से जल शक्ति मंत्रालय को समर्थन मिले जिससे शीघ्र ही ‘घर-घर नल’ का सपना साकार हो।

Author Published on: September 6, 2019 4:44 AM
2 सितंबर को गणपति मूर्ति हुई थी।

देश में इन दिनों गणपति महोत्सव बड़ी धूमधाम से मनाया जा रहा है। इसमें लोग अपने घरों-मोहल्लों में गणेशजी की मूर्तियां स्थापित करते हैं। लेकिन आस्था के साथ-साथ पर्यावरण को बचाने की नैतिक जिम्मेदारी भी हमारे कंधों पर है क्योंकि इन मूर्तियों का विसर्जन नदियों, जलाशयों में किया जाना निश्चित है। वास्तव में नदियां राष्ट्र की जीवनदायिनी होती हैं और इनका संरक्षण करना हमारा कर्तव्य है। इसलिए सरकार द्वारा निर्धारित स्थलों पर ही मूर्तियों के विसर्जन करना चाहिए ताकि नागरिक-सरकार सहयोग से प्राकृतिक स्रोतों को प्रदूषण से बचाया जा सके और अप्रत्यक्ष रूप से जल शक्ति मंत्रालय को समर्थन मिले जिससे शीघ्र ही ‘घर-घर नल’ का सपना साकार हो।
’कपिल एम वड़ियार, पाली, राजस्थान

मौत के पटाखे
पंजाब के बटाला में बीते बुधवार को जो हुआ वह अपेक्षित ही था। घने रिहाइशी इलाके में पटाखे बनाने की फैक्ट्री पूरी तरह ध्वस्त हो गई। तेईस लोग मारे गए। इससे किसी को क्या फर्क पड़ता है! बस जांच के आदेश दे दिए गए हैं। मुआवजे का ऐलान हो गया है जैसा कि हर हादसे के बाद होता है। वही रस्मअदायगी गुरदासपुर में भी की गई थी। उसके बाद यही कहानी कहीं और दोहराई जाएगी।
पटाखों से प्रदूषण बढ़ता है। जान-माल का नुकसान होता है। पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने भी पटाखों पर प्रतिबंध लगा दिया था। बावजूद इसके, किसी को कोई फर्क ही नहीं पड़ रहा है। दक्षिण का शिवकासी तो पटाखों का शहर ही माना जाता है। वहां कई दुर्घटनाओं में सैकड़ों लोग मारे गए। 10 अप्रैल 2016 को केरल में कोल्लम के पुत्तिंगल मंदिर में सुबह तीन बजे पटाखों से लगी आग के कारण 111 लोग मारे गए थे और 150 से अधिक घायल हुए थे। फिर भी पटाखों से छुटकारा पाने के लिए कोई कुछ नहीं कर रहा है। मतलब, हादसों और मौतों से ज्यादा तरजीह हम अपनी आस्था को देते हैं। हम लोगों को आविष्कार से अधिक चमत्कार में विश्वास है। जब तक ऐसा है, ये हादसों से लोग मरते रहेंगे।
’जंग बहादुर सिंह, जमशेदपुर, बिहार

जाति की जगह
हमारे देश की अनेक सामाजिक संस्थाओं खास तौर पर हॉस्टलों के नाम जातियों पर रख दिए गए हैं। मसलन जाट हॉस्टल, राजपूत हॉस्टल, ब्राह्मण छात्रावास, मीणा छात्रावास, यादव हॉस्टल आदि-आदि। जब हम पहले से ही हॉस्टलों को उनकी जाति या वर्ण से चिह्नित करते हैं तो समाज को जातिगत खांचों में बांट कर कोई अच्छा संदेश नहीं देते हैं बल्कि छात्रों में जातिगत भेदभाव और कटुता को ही बढ़ावा देते हैं। अगर हमारा देश धर्मनिरपेक्ष है तो ऐसे नामकरण धर्मनिरपेक्षता की कोई सार्थक मिसाल बिल्कुल भी पेश नहीं करते। समय आ गया है जब जातियों के आधार पर संस्थाओं का नामकरण करने की परंपरा को समाप्त किया जाए।
बहुत पहले की बात है। मेरा तबादला राजस्थान के एक दूरदराज इलाके में हुआ था। जब तक मैं अपने परिवार को ले जाता, मैंने वहां के एक अच्छे और चर्चित हॉस्टल/ विश्रामालय में ठहरने का मन बनाया। संपर्क करने पर हॉस्टल के मैनेजर ने साफ कह दिया कि यह एक विशेष संप्रदाय के लोगों के लिए सेठजी ने खोला है, सभी के लिए नहीं। मेरे खूब निवेदन करने पर भी प्रबंधक महोदय माने नहीं। आखिर जो सामाजिक संस्थाएं अथवा हॉस्टल जरूरत पड़ने पर आपके काम न आएं और अपनी जातिवादी मानसिकता पर अडिग रहें, उनकी समाजसेवा और जातिगत अस्मिता किस काम की?
’शिबन कृष्ण रैणा, अलवर

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