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चौपाल: महंगी परीक्षा व सांसदों का फर्ज

लंबे इंतजार के बाद मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग ने राज्य सेवा एवं राज्य वन सेवा परीक्षा का विज्ञापन जारी किया।

Author Published on: November 21, 2019 2:54 AM
राज्य सरकारों को संघ लोक सेवा आयोग से इस मामले में सीख लेनी चाहिए।

लंबे इंतजार के बाद मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग ने राज्य सेवा एवं राज्य वन सेवा परीक्षा का विज्ञापन जारी किया। इससे इस परीक्षा की तैयारी करने वाले लाखों उम्मीदवारों ने राहत की सांस ली। लेकिन इस विज्ञापन में आवेदन शुल्क को तीन गुना अधिक बढ़ा कर पंद्रह सौ रुपए कर दिया गया है। सरकार के इस अव्यवहारिक कदम से प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने वाले उम्मीदवारों को न केवल घोर निराशा हुई है, बल्कि उन्हें चिंतित भी कर दिया है। वैसे यह कोई नई बात नही है। आजकल अधिकांश राज्य सरकारें ऐसा कर रही है, चाहे मध्य प्रदेश हो, बिहार हो, झारखंड हो, कोई राज्य इससे अछूता नही है। एक तरफ तो ये सरकारें तरह-तरह की सरकारी योजना और छात्रवृत्ति योजनाओं के माध्यम से छात्रों को आर्थिक सहायता मुहैया कराने की बात करती हैं, वहीं दूसरी तरफ प्रतियोगिता परीक्षा के आवेदन शुल्क के नाम पर मोटी फीस वसूली जा रही है।

सरकार जानती है कि सभी छात्र साल में कई प्रतियोगी परीक्षाओं में बैठते हैं और इतना ज्यादा आवेदन शुल्क इनके लिए गंभीर आर्थिक समस्याएं खड़ी कर देता है। सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि रोजगार के लिए जारी विज्ञापन का आवेदन शुल्क सिर्फ सांकेतिक हो, साथ ही किसी भी प्रतियोगिता परीक्षा का प्रथम प्रयास सभी उम्मीदवारों के लिए निशुल्क किया जाना चाहिए जिससे सभी को समान रूप से परीक्षा देने का अवसर मिल सके। किसी भी सरकार का मकसद प्रतियोगिता परीक्षा के आवेदन शुल्क से धन जमा करना कतई नहीं होना चाहिए। इस तरह का कदम आर्थिक रूप से कमजोर उम्मीदवारों को परीक्षा से वंचित रखने की साजिश है।

जिस तरह से राज्य सरकारें आवेदन शुल्क के नाम पर छात्रों से मनमाने तरीके से फीस वसूल रही हैं, उसे देखते हुए केंद्र सरकार को चाहिए कि इस पर कोई ठोस कानून लाया जाया जो आवेदन शुल्क निर्धारित करने की प्रक्रिया को नियंत्रित करे। राज्य सरकारों को संघ लोक सेवा आयोग से इस मामले में सीख लेनी चाहिए कि कैसे न्यूनतम आवेदन शुल्क में बेहतर व्यवस्था के साथ तय समय सीमा में परीक्षा से लेकर परिणाम तक का प्रकाशन किया जा सकता है।

’सत्य प्रकाश, चकसाहों,पटोरी (समस्तीपुर)

सांसदों का फर्ज

संसदीय लोकतंत्र में संसद को सुचारू रूप से चलाने का जिम्मा सरकार और विपक्ष दोनों का होता है। लेकिन हर बार संसद के सत्र कमोबेश हंगामे की भेंट चढ़ जाते हैं। सत्र शुरू होने से पहले संसद को सुचारू रूप से चलाने के लिए जो सर्वदलीय बैठक आयोजित की जाती है, वह भी मात्र औपचारिक बन के रह जाती है। संसद का शीतकालीन सत्र शुरू हो चुका है और कयास लगाए जा रहे हैं कि इस बार भी सत्र हंगामेदार होगा।

संसद सत्र का एक-एक दिन बहुत महत्त्वपूर्ण होता है, इसलिए हर दल के हरेक सदस्य को इसका महत्त्व समझना चाहिए। सभी को एक दूसरे का सहयोग करना चाहिए। सांसदों का पहला दायित्व आम आदमी की समस्याओं को उठाना है। शोरगुल और हंगामे की वजह से अगर संसद की कार्यवाही में अगर बाधा आती है तो इससे ज्यादा नुकसान देश और आम लोगों को ही होता है।

’नीतीश कुमार पाठक, आश्रम, दिल्ली

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