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चौपाल: हमारा पर्यावरण

पेड़ लगाते हुए फोटो खींच कर सोशल मीडिया पर डालने और छपवाने से ही धरती पर हरियाली नहीं आने वाली। हमें पर्यावरण की रक्षा के लिए हमेशा तन, मन और धन से जुटे रहना होगा।

Author Published on: July 5, 2019 2:24 AM
पर्यावरण पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं

इस बार विश्व पर्यावरण दिवस पर वॉट्सएप और फेसबुक पर बहुत सारे पेड़ लगाए गए यानी पर्यावरण दिवस की शुभकामनाएं वाले संदेशों का खूब आदान-प्रदान हुआ। बहुत सारे मित्रों ने पेड़ लगाते हुए अपनी फोटो फेसबुक पर डालीं, जिन पर खूब ‘लाइक’ और ‘कमेंट’ आए। लेकिन पर्यावरण दिवस के अगले दिन न किसी का पेड़ लगाते फोटो दिखा और न कहीं से पर्यावरण की रक्षा के लिए संदेश आए। दरअसल, पेड़ लगाते हुए फोटो खींच कर सोशल मीडिया पर डालने और छपवाने से ही धरती पर हरियाली नहीं आने वाली। हमें पर्यावरण की रक्षा के लिए हमेशा तन, मन और धन से जुटे रहना होगा।
’सौरभ कुमार ठाकुर, रतनपुरा, गिद्धा, मुजफ्फरपुर

नाखुश अमेरिका
भारत और जापान की बढ़ती दोस्ती से अमेरिका नाखुश दिखाई दे रहा है। कार बनाने से शुरू हुई भारत और जापान की दोस्ती अब बुलेट ट्रेन तक आ गई है। यही वजह है कि ओसाका में जी-20 शिखर सम्मेलन में जापानी प्रधानमंत्री शिंजो आबे ने भारतीय प्रधानमंत्री का स्वागत काफी गर्मजोशी से किया। इसके साथ ही कई अन्य मामलों पर विचार-विमर्श करके महत्त्वपूर्ण फैसले भी लिए, जो भारत के हित में हैं। मगर अमेरिका की अलग बैचेनी है। लगता है कि वह अमेरिकी उत्पादों पर शुल्क बढ़ाने से उतना परेशान नहीं है, जितना भारत की तरक्की से है। भारत ने जैसे ही गूगल, अमेजॉन आदि कंपनियों का डाटा संग्रह करना शुरू किया हैं वैसे ही अमेरिकी कंपनियों को परेशानी महसूस हो रही है। दूसरी ओर जापान और भारत एक-दूसरे की संस्कृति का भी सम्मान करने लगे हैं, जिस कारण दोनों मुल्कों में दोस्ती अब गहराती नजर आ रही है।
’दिनेश चौधरी, सुरजापुर, सुपौल, बिहार

जल संकट
देश में जल संकट लगातार गहराता जा रहा है लेकिन इसका समाधान प्रकृति में ही छिपा है। प्रकृति ही जल संकट का स्थायी और सहज समाधान कर सकती है। उसने हजारों सालों से पर्याप्त मात्रा में पानी की सुगम उपलब्धता बनाए रखी है। हमारा समाज सदियों से बुद्धिमत्ता और प्राकृतिक नीति-नियमों के अनुसार ही न्यूनतम जरूरत के लिए पानी लेता रहा। लेकिन पिछले पांच-छह दशकों से समाज ने पानी को अपने सीमित हितों के लिए अंधाधुंध खर्च कर पीढ़ियों से चले आ रहे समाज स्वीकृत प्राकृतिक नीति-नियमों की अनदेखी करनी शुरू कर दी है। तभी से पानी की समस्या बढ़ती चली गई। हमने अब भी प्रकृति के नियमों के साथ खिलवाड़ जारी रखा तो आने वाली पीढ़ियां कभी भी पानी से लबालब जल स्रोतों को देख नहीं सकेंगी। पानी को किसी प्रयोगशाला में नहीं बनाया जा सकता लिहाजा, कुओं व तालाबों को बचाना होगा, जंगलों को कटने से रोकना होगा। जैव विविधता का संरक्षण जरूरी है। नदियों की गुणवत्ता पर ध्यान देना होगा। बारिश के पानी का संरक्षण करना होगा। नए तालाब व छोटे-छोटे बांध बनाने होंगे।
’अजीत कुमार गौतम, गोरखपुर, उत्तर प्रदेश

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