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चौपाल: रोजगार का सपना

चपरासी और लिपिक जैसी परीक्षा के आवेदन के लिए पांच-सात सौ रुपए का भुगतान करना पड़ता है।

Author नई दिल्ली | Published on: January 24, 2020 1:20 AM
रेलवे को चतुर्थ श्रेणी के पदों के लिए भी करोड़ों की संख्या में आवेदन प्राप्त हुए हैं।

जब राजग सरकार दूसरी बार केंद्र में सत्तारूढ़ हुई तो उसके लिए बेरोजगारी बड़ा मुद्दा था। लेकिन लगता है, वक्त बीतने के साथ सरकार बेरोजगारों के मुद्दे को ठंडे बस्ते में डाल चुकी है। विपक्ष भी कभी बेरोजगारी पर सरकार को घेर नहीं पाया। सरकार आज जो रिक्तियां निकाल रही है, उनमें लाखों में आवेदन पहुंच रहे हैं। रेलवे को चतुर्थ श्रेणी के पदों के लिए भी करोड़ों की संख्या में आवेदन प्राप्त हुए हैं। हरियाणा में पांच हजार क्लर्क की भर्ती के लिए पंद्रह लाख युवाओं ने परीक्षा दी। भर्ती और आवेदनों की संख्या को देखते हुए कहना गलत नहीं होगा कि ज्यादातर को तो हाथ मलते हुए अगली बार नौकरी के इंतजार में बैठना होगा।

यदि हम निजी क्षेत्र की नौकरियों की बात करें तो फिलहाल उसमें भी हालात खराब हैं। वाहनों की बिक्री कम हुई है, कारखाने बंद होने की कगार पर हैं। कारीगरों को बिक्री घटने का आश्वासन देकर बाहर का रास्ता दिखाया जा रहा है। ऐसे समय में जब सरकार को युवाओं के साथ खड़े होना चाहिए, नए रोजगार पैदा करने की दिशा में कदम बढ़ाने चाहिए तब सरकार टैक्स बढ़ाने में जुटी है। पेट्रोल के दाम बढ़ा कर युवाओं को बाइक से उतारने में लगी है। यहां तक कि परीक्षाओं की फीस बढ़ाने से भी हिचक नहीं रही है। चपरासी और लिपिक जैसी परीक्षा के आवेदन के लिए पांच-सात सौ रुपए का भुगतान करना पड़ता है। सवाल है कि सालों से बेरोजगार घूम रहे युवा इतनी ज्यादा फीस का बंदोबस्त कहां से करेंगे? इतनी ज्यादा फीस का भुगतान करके भी रोजगार की कोई गारंटी नहीं। लाखों की संख्या में आ रहे आवेदनों से परीक्षा बोर्ड को भारी-भरकम आमदनी हो रही है। परीक्षा और परिणाम देखते युवाओं की उम्र बीतती जा रही है, पर रोजगार के आसार दूर-दूर तक नजर नहीं आ रहे।

देश का कल आज से अच्छा होगा, यह सपना अब हवा हो रहा है। नारों में कल, यानी भविष्य की बड़ी बातें हैं पर अखबारों की सुर्खियां तो गिरते रुपए, गिरते शेयर बाजार और बंद होती फैक्ट्रियों की हैं। सरकार भरोसा दिला रही है कि हम यह करेंगे वह करेंगे, पर हर युवा जानता-समझता है कि कल का भरोसा नहीं है। इसमें दोष युवाओं का भी है। पिछले कुछ सालों में उन्होंने खुद अपने भविष्य को खराब किया है। कभी वे धार्मिक पार्टियों से जुड़ कर मौज मनाते तो कभी रेव पार्टियों में। हर शहर में हुक्का बार बनने लगे, फास्टफूड रेस्तरांओं की भरमार होने लगी। युवा प्रयोगशाला में प्रयोग करने की जगह अड्डों पर जमा होने लगे हैं। जिन्हें रात-दिन लाइब्रेरी और कंप्यूटरों से ज्ञान बटोरना था वे सोशल मीडिया पर बासी वीडियो और जोक्स परोसने में लग गए हैं। अपना भविष्य युवाओं को खुद ही बचाना होगा।

पच्चीस साल पहले चीन के बीजिंग शहर में थ्येन आन मन चौक पर युवाओं ने कम्युनिस्ट शासकों को जो झटका दिया उसी से चीन की नीतियां बदलीं और आज चीन अमेरिका के बराबर खड़ा है। यदि हम आज सचेत नहीं हुए तो घरों में पिज्जा, पास्ता खाने वाली युवा आबादी को बेरोजगारी में पिसना भी सीखना होगा।

’रोहित यादव, महर्षि दयानंद विवि, रोहतक

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