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चौपाल: बढ़ती तल्खी

भारत में लेन-देन करने वाली हर कंपनी के लिए स्थानीय स्तर पर डाटा रखना अनिवार्य कर दिया गया है। साथ ही, ई-कॉमर्स के नियमों में आवश्यक बदलाव किए गए हैं। इन दोनों कदमों से गूगल, व्हाट्सएप और अमेजॉन जैसी अमेरिकी कंपनियों को परेशानी हो रही है।

Author July 3, 2019 2:02 AM
भारतीय पीएम नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप। (file pic)

भारत में अमेरिकी उत्पादों पर शुल्क की कथित उच्च दरें घटाने से संबंधित राष्ट्रपति ट्रंप की चेतावनी को दोनों देशों के बीच व्यापारिक तल्खी से जोड़ कर देखा जा सकता है। अमेरिका की मंशा ‘डाटा लोकलाइजेशन’ और ई-कॉमर्स से संबंधित नियमों में भारत द्वारा लाए गए बदलावों को लेकर दबाव बनाने की भी है। गौरतलब है कि भारत में लेन-देन करने वाली हर कंपनी के लिए स्थानीय स्तर पर डाटा रखना अनिवार्य कर दिया गया है। साथ ही, ई-कॉमर्स के नियमों में आवश्यक बदलाव किए गए हैं। इन दोनों कदमों से गूगल, व्हाट्सएप और अमेजॉन जैसी अमेरिकी कंपनियों को परेशानी हो रही है। वैसे मुद्दे दूसरे भी हैं खासतौर पर खाड़ी में अमेरिका और ईरान के बीच बन रहे हालात से भारत असहज है। दोनों मुल्कों को अपने बीच पनपती इन तल्खियों को दूर करने के लिए काफी मेहनत करनी पड़ेगी।
’भूपेंद्र रंगा, पानीपत, हरियाणा

जल संरक्षण
प्रधानमंत्री ने देश में पानी की समस्या से जुड़ी चुनौतियों के बारे में बात करते हुए लोगों से स्वच्छता आंदोलन की तरह ‘जल संरक्षण’ आंदोलन चलाने का आग्रह किया है। साथ ही, जल संरक्षण के पारंपरिक तौर तरीकों के बाबत इस आंदोलन में जुटे लोगों, गैर सरकारी संगठनों आदि से जानकारी साझा करने की अपील की है ताकि एक विस्तृत ब्योरा तैयार हो सके। सत्ता में दोबारा लौटने के बाद प्रधानमंत्री ने अपनी पहली ‘मन की बात’ में जल संरक्षण पर जोर दिया जिससे साफ है कि यह सरकार की प्राथमिकताओं में भी सबसे ऊपर है। उन्होंने जल की महत्ता बताते हुए कहा कि हमारे देश में वर्षा जल का सिर्फ आठ फीसद बचाया जाता है। वर्षा जल संरक्षण के लिए उन्होंने देश के सरपंचों और प्रधानों को पत्र भी लिखा था। उन्होंने अनुरोध किया कि पूरा देश इकट्ठा होकर इस मुहिम को आगे बढ़ाए। जल संरक्षण के लिए कई तरीके अपनाए जाते रहे हैं। जाहिर है, नई सरकार जल संरक्षण को लेकर सबसे ज्यादा तेज कदम बढ़ाती दिखेगी।
’मेघा सिंघल, आइआइएमटी, ग्रेटर नोएडा

मुनाफे के स्कूल
इन दिनों देश के सभी राज्यों में कुकुरमुत्तों की तरह नित नए निजी स्कूल खुलते जा रहे हैं। इनका मकसद केवल पैसा कमाना है। इनके पास न तो तय मापदंडों के मुताबिक भवन, फर्नीचर, खेल मैदान, प्रशिक्षित शिक्षक व अन्य संसाधन हैं और न ही बच्चों का भविष्य संवारने की कोई दूरदृष्टि। सरकार की ओर से मान्यता देने के नियमों को ताक पर रख क र नौकरशाही भी अपना उल्लू सीधा करने में लगी हुई है। सरकार को इस बात पर सख्त निगरानी रखते हुए सर्व सुविधा संपन्न स्कूलों को ही अनुमति प्रदान करनी चाहिए। वर्दी, पुस्तकें आदि तयशुदा दुकान से खरीदने की बाध्यता भी समाप्त की जानी चाहिए।

निजी स्कूलों के फीस के नियम भी नए सिरे से तय होने चाहिए। सरकार को नए स्कूल भवन निर्माण के बजाय उपलब्ध स्कूलों में ही संसाधन बढ़ाने पर ध्यान देना चाहिए। शिक्षकों के विषयवार रिक्त पदों को शीघ्र भरा जाना चाहिए। सरकारी स्कूलों को उच्च तकनीक से युक्त बनाना आवश्यक है ताकि लोगों में इनके प्रति आकर्षण बढ़े और वे अपने बच्चों का दाखिला उनमें कराने के लिए प्रेरित हों। नैतिक शिक्षा, योग और खेलों को शासकीय और अशासकीय सभी विद्यालयों में अनिवार्य किया जाना चाहिए। बच्चों के सर्वांगीण विकास और मूल्यांकन की नवीन पद्धति विकसित करना भी बहुत जरूरी है।
’ललित महालकरी, इंदौर, मध्यप्रदेश

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