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चौपाल: अपारदर्शिता का चंदा

किसी भी देश के लिए विपक्ष लोकतंत्र और उसके नागरिकों के लिए तीसरी आंख से कम नहीं होती।

Author Published on: January 14, 2020 1:31 AM
आज सरकार खुल कर और एक अग्रगामी रूप में अपने नागरिकों के लिए बेहतर और समावेशी विकास की रणनीति इसलिए नहीं ला पा रही है।

भारत को आजादी हासिल किए सत्तर साल से आधिक हो गए हैं। न केवल भारत के लोग, बल्कि वे लोग भी जिन्होंने देश को आजाद कराया था, उनकी आकांक्षा थी कि इस देश कि राजनीति एक आदर्श की तरह होगी और संविधानसम्मत चलेगी, अपने नागरिकों का उत्तम खयाल रखेगी। इतना ही नहीं, विपक्ष से भी यही उम्मीद थी कि उनकी तरफ से भी विरोध होगा, लेकिन अपनी महत्त्वाकांक्षाओं के लिए नहीं, बल्कि सत्ता पक्ष की गलत दिशा और दशा से युक्त नीतियों पर। लेकिन आज सत्ता पक्ष सोच रहा है कि संसद में हमारा हर तरफ से बहुमत हो, ताकि हम आसानी से मनमाना कानून बना सकें, वहीं विपक्ष को नकारात्मक विरोध से मौका नहीं मिल रहा। किसी भी देश के लिए विपक्ष लोकतंत्र और उसके नागरिकों के लिए तीसरी आंख से कम नहीं होती, क्योंकि सही रास्ता दिखाना और उचित नीतियों के बारे में दिशानिर्देश देना विपक्ष का कर्तव्य होता है।

आज सरकार खुल कर और एक अग्रगामी रूप में अपने नागरिकों के लिए बेहतर और समावेशी विकास की रणनीति इसलिए नहीं ला पा रही है और न इसे अच्छी तरीके से लागू कर पा रही है। राजनीति को आज स्वतंत्र नहीं रहने दिया गया है, क्योंकि सभी पार्टियां तो चंदे देने वाले के इशारे से चलती है। इसका अगर एक उदाहरण देखा जाए तो जैसे एक बड़ी कंपनी जो कीटनाशक का उत्पादन कर रही है और इसका कारोबार भारत में अच्छे से चल रहा है, लेकिन धीरे-धीरे एक लहर आती है कि अब कार्बनिक और जैविक खेती करना होगा, अन्यथा हमारा पर्यावरण और हमारे अपने खुद ही अस्वस्थ होकर काल के मुंह में जाने लगेंगे। अब लोगों ने सोचा कि इस अच्छी पहल पर सरकार भी हमारी बढ़-चढ़ कर मदद करेगी।

लेकिन उनको कहां पता था कि वोट से बढ़ कर मूल्य चंदा का होता है। अब अगर सरकार जैविक खेती को बढ़ावा दे तो उधर कीटनाशक कंपनी नाराज हो जाएगी और सरकार पर दबाव बनाएगी। ऐसी स्थिति में सरकार को जनता के सामने कुछ पत्ते खेलना होगा, इधर का मुद्दा उधर, उधर का इधर! इस राजनीतिक चंदे पर विशेष रूप से समीक्षा करके इसको पूर्ण पारदर्शी बनाना होगा। राजनीतिक दलों का पूरा लेन-देन और चुनावी व्यवस्था पारदर्शी होगी, तभी लोकतंत्र जिंदा रह पाएगा।

’कुंदन वर्मा, बहराइच, उत्तर प्रदेश

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