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चौपाल: बीच भंवर में

मगर चीन ने अपनी एक संतान नीति 2015 में ही समाप्त कर दी थी क्योंकि उस नीति से देश में युवा आबादी की तुलना में बुजुर्गों की संख्या तेजी से बढ़ने लगी थी। भारत न तो चीन बन सकता है, न अपनी विकास दर को 12 से 15 फीसद कर सकता है। बीच भंवर में हम फंस गए हैं।

Author July 2, 2019 1:44 AM
नौकरी के नाम पर युवाओं को कम वार्षिक पैकेज का प्रस्ताव दिया जाता है।

कहते हैं कि दुनिया की हर समस्या और परेशानी की वजह आबादी का बढ़ रहा बोझ है। चीन की आबादी इस वक्त एक अरब 42 करोड़ है और भारत की एक अरब 37 करोड़। फासला सिर्फ पांच करोड़ का है। एक अनुमान के अनुसार अगले आठ वर्षों में हम आबादी के मामले में चीन को पीछे छोड़ देंगे। कहते यह भी हैं कि आबादी बढ़ने से देश का जीडीपी बढ़ता है, आय में वृद्धि होती है। मगर भारत में ऐसा कुछ होता दिखाई नहीं दे रहा है। बेरोजगारी के वजह से देश का युवा त्राहिमाम-त्राहिमाम कर रहा है। अब भी जीडीपी की दर सात फीसद के अंदर है। अगले साल का अनुमान भी इससे अच्छा नहीं दिख रहा है। ऐसे में हमारा देश जनसंख्या विस्फोट को कैसे संभाल पाएगा?

कुछ लोग कह रहे हैं कि चीन की तर्ज पर जनसंख्या वृद्धि पर लगाम लगाई जानी चाहिए। मगर चीन ने अपनी एक संतान नीति 2015 में ही समाप्त कर दी थी क्योंकि उस नीति से देश में युवा आबादी की तुलना में बुजुर्गों की संख्या तेजी से बढ़ने लगी थी। भारत न तो चीन बन सकता है, न अपनी विकास दर को 12 से 15 फीसद कर सकता है। बीच भंवर में हम फंस गए हैं।
’जंग बहादुर सिंह, गोलपहाड़ी, जमशेदपुर

नई चुनौतियां
नई केंद्र सरकार को देश के सामने मुंह बाये खड़ी समस्याओं जैसे- बेरोजगारी, गिरता भूजल, वायु-जल व ध्वनि प्रदूषण, पराली जलावन का बढ़ता प्रचलन, महिला सुरक्षा, आतंकवाद, भ्रष्टाचार, यातायात व पार्किंग समस्या आदि से दिन-रात पंजा लड़ाने की आवश्यकता है। धारा 370 और 35 अ के मामले में धरातल पर काम नजर आए न कि यह महज चुनावी घोषणा बन कर रह जाए। तीन तलाक समेत तमाम मुद्दों पर अपनी प्रतिबद्धता दिखाने समय आ चुका है। पाकिस्तान के साथ जलसंधि में भारत के हक का जो पानी व्यर्थ ही पाकिस्तान की तरफ जा रहा है, उसे रोक कर पंजाब और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के गिरते भूजल स्तर और कृषि के लिए उपलब्ध करा देना केंद्र सरकार की बड़ी कामयाबी बनाई जा सकती है।

कश्मीर के आतंकवाद को वैसे ही नेस्तनाबूद किए जाने की आवश्यकता है जिस प्रकार पंजाब के आतंकवाद को किया गया था। शिक्षा के क्षेत्र में पिछली सरकार के कार्यकाल में न के बराबर काम हुआ, अब इसमें कुछ अधिक काम करने की आवश्यकता है। किसानों की आय दुगनी करना और 2022 तक सबको मकान का नारा फलीभूत हो, इसके लिए सरकार को द्रुुत गति का विकास इंजन लगाने की भी आवश्यकता पड़ेगी। ‘सबका साथ-सबका विकास और सबका विश्वास’ के सिद्धांत से जात-पात और सांप्रदायिक सोच को भुला कर सौहार्दपूर्ण माहौल बनाए रखना होगा।
अधिक प्रचंड बहुमत न केवल अपेक्षाएं बढ़ाता है बल्कि सरकार के कंधों पर भी अधिक वजन डालता है इसलिए प्रधानमंत्री को अपने प्रत्येक विभाग के कंधों की समय-समय पर जांच करनी होगी। जनता प्रतीक्षा नहीं करेगी बल्कि तुरंत नतीजे देखना चाहेगी, इस बात को ध्यान में रख कर अन्य मंत्रियों को भी प्रधानमंत्री की तरह अठारह घंटे का परिश्रमी होना पड़ेगा तभी नए भारत का निर्माण हो पाएगा।
’सतप्रकाश सनोठिया, रोहिणी, दिल्ली

एक साथ चुनाव
मुल्क की माली हालत को देखते हुए हर वर्ष अलग-अलग समय पर होने वाले चुनावों-उपचुनावों का बोझ देश नहीं सह सकता है। एक साथ चुनाव होने से सरकारी खजाने में अरबों रुपए बच सकते हैं, साथ ही समय व श्रम की भी बचत होगी। लिहाजा, सभी दलों को सर्वमान्य हल निकालते हुए ‘एक देश एक चुनाव’ पर अपनी रजामंदी की मोहर लगानी चाहिए। विचारधाराएं भले ही सभी दलों की अलग हों, लेकिन उनका मूल मकसद तो देश का कल्याण ही है।
’हेमा हरि उपाध्याय, खाचरोद, उज्जैन, मध्यप्रदेश

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