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चौपाल: अपराधियों का आतंक

गोपीगंज की यह दुखद घटना पुलिस और कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है। गोपीगंज पुलिस ने इस अमानवीय और मनुष्यता को शर्मसार करने वाली घटना को अंजाम देने वालों के खिलाफ कठोर कार्रवाई करने के बजाय मामले को रफा-दफा करने की कोशिश की।

Author January 7, 2019 6:13 AM
तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक रूप से किया गया है। (एक्सप्रेस फाइल फोटो)

आपके समाचार पत्र में एक जनवरी को प्रकाशित संपादकीय पढ़ा। उत्तर प्रदेश के भदोही जिले के गोपीगंज में एक गरीब और कमजोर तबके की महिला के साथ वहां के कुछ गुंडों ने पहले छेड़खानी की, और फिर महिला के विरोध करने पर उसके घर पर हमला कर दिया, उसे खूब पीटा, और फिर उसके कपड़े फाड़ कर पूरे गांव में घुमाया। सबसे दुखद और विस्मित करने वाली बात इसमें यह है कि उस पूरे क्षेत्र में उस महिला के पक्ष में कोई खड़ा नहीं हुआ। किसी ने हिम्मत नहीं दिखाई बदमाशों का विरोध करने की! भारतीय गांवों में यह आम बात होती है, कमोबेश कस्बों और शहरों में भी यही स्थिति होती है। हर जगह स्थानीय गुंडों, भूमाफियाओं, पुलिस के दलालों आदि के समूह संगठित होकर ‘कुछ’ भी करते रहते हैं, और पढ़ा-लिखा समाज भी डरा हुआ-सा इन असामाजिक तत्वों के कुकृत्य को देखता रहने को बाध्य है।

गोपीगंज की यह दुखद घटना पुलिस और कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है। गोपीगंज पुलिस ने इस अमानवीय और मनुष्यता को शर्मसार करने वाली घटना को अंजाम देने वालों के खिलाफ कठोर कार्रवाई करने के बजाय मामले को रफा-दफा करने की कोशिश की। हकीकत यह है कि भारतीय समाज की जातिवादी व्यवस्था में ऐसे जितने कुकृत्य होते हैं, वे निश्चित रूप से कमजोर, पिछड़ी और दलित जाति की लड़कियों और महिलाओं के साथ स्थानीय दबंग जातियों के लोग करते हैं, जिनका उस क्षेत्र के पुलिस थानों, प्रशासन और पूरे क्षेत्र पर पूरी तरह दबदबा रहता है।
’निर्मल कुमार शर्मा ,गाजियाबाद

सबरीमाला में प्रवेश
केरल के सबरीमाला मंदिर में सुप्रीम कोर्ट द्वारा महिलाओं के प्रवेश को मंजूरी देने के बाद गुजरे बुधवार को आठ सौ साल में पहली बार दो महिलाओं ने मंदिर में प्रवेश किया। यह दिन भारतवर्ष की सभी महिलाओं के लिए एक ऐतिहासिक और यादगार दिन से कम नहीं होगा, क्योंकि सदियों से चली आ रही रूढ़िवादी प्रथा को तोड़ते हुए दोनों महिलाओं ने अपने हक और समानता की लड़ाई के लिए कड़े विरोध के बीच अपनी जान की परवाह न करते हुए मंदिर में प्रवेश किया और जीत हासिल की। हालांकि महिलाओं के प्रवेश की जानकारी के बाद मंदिर प्रशासन द्वारा मंदिर का शुद्धीकरण करवाना और लोगों द्वारा तोड़फोड़ करने से यह भी साफ हो गया कि आज भी भारतीय समाज रूढ़िवादी और लिंगभेद की सोच से कितना भरा पड़ा है। लेकिन महिलाओं की निडरता और जागरूकता ही उनके प्रवेश का कारण बनी है। इससे एक दिन पहले मंगलवार को लाखों महिलाओं का लिंग भेद के प्रति छह सौ बीस किलोमीटर की यात्रा निकलना इस बात का सबूत है कि महिलाएं अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होने लगी हैं।
’अखिल सिंघल, नई दिल्ली

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