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चौपाल: कानून और नैतिकता

आवश्यकता इस बात की है कि धारा 497 में लैंगिक समानता के अनुरूप संशोधन किया जाए। दैहिक स्वतंत्रता के नाम पर नैतिक मूल्यों को दरकिनार करने का परिणाम समाज में ‘विवाह’ संस्था के विघटन के रूप में सामने आ सकता है।

Author October 12, 2018 6:06 AM
प्रतीकात्मक चित्र

हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने भारतीय दंड संहिता की धारा 497 में वर्णित व्यभिचार (एडल्ट्री) को अपराध की श्रेणी से बाहर करते हुए इसे एक सामाजिक बुराई (अनैतिक कार्य) के रूप में उल्लेखित किया है। इस निर्णय से कुछ प्रश्न उभर कर आते हैं कि क्या नैतिकता और कानून में एकरूपता होनी चाहिए? क्या नैतिकता ही कानून का आधार होनी चाहिए? प्रथम प्रश्न के संदर्भ में, चूंकि नैतिकता की सामाजिक स्वीकार्यता होती है इसलिए नैतिकता और कानून में साम्य होने से कानून का पालन आसानी से होता है। वहीं नैतिकता अर्थात सामाजिक स्वीकार्यता के अभाव में कानून का पालन कठिन हो जाता है। जैसे, समाज में दहेज की स्वीकार्यता होने के कारण दहेज प्रथा निवारण अधिनियम 1961 का सफलतापूर्वक क्रियान्वयन नहीं हो सका है मगर सती प्रथा की आज समाज में स्वीकार्यता न होने के कारण सती प्रथा निवारण अधिनियम 1987 का क्रियान्वयन सफलतापूर्वक हो सका है। साथ ही, नैतिकता और कानून में विरोधाभास से सामाजिक तनाव की स्थिति पैदा हो सकती है क्योंकि पुलिस व सरकार (कानून को अमलीजामा पहनाने व लागू करने वाले अंग) भी समाज का ही हिस्सा होते हैं लिहाजा, पुलिस और सरकार भी विरोधाभासी कानून को लागू करने में ढील बरत सकते हैं अथवा सख्ती से लागू करने में हिचकिचा सकते हैं। हम नैतिकता से इतर (जो आदर्श रूढ़िवादिता अथवा आधुनिकता के अभाव के कारण तात्कालिक समाज में अनैतिक समझे जाते हों) महज उन कानूनों को अनुमति दे सकते हैं जो नैतिकता अथवा समानता जैसे मूल्यों को बढ़ाने वाले हों, जैसे धारा 377 के जरिए समलैंगिकता को मान्यता प्रदान करना।

दूसरे प्रश्न के उत्तर के क्रम में, आदर्श स्थिति में नैतिकता को कानून का आधार होना चाहिए लेकिन इसके अलावा सामाजिक न्याय, लोक कल्याण, प्राकृतिक न्याय, नैतिकता को वैज्ञानिक तर्कों की कसौटी पर कसना (जैसे पुरातन समाज में सती प्रथा नैतिक कही जाती थी लेकिन समय के साथ तर्क के आधार पर भारतीय समाज ने उसे अनैतिक करार दिया), कानून और व्यवस्था, आम भलाई, नैतिकता को बढ़ाने में सहायक तत्त्व आदि आधारों को भी विधि निर्माण के लिए चिह्नित किया जा सकता है। क्या भारतीय समाज सर्वोच्च न्यायालय के हालिया निर्णय को आत्मसात करने के लिए तैयार है? क्या भारतीय समाज इस निर्णय के अनुरूप प्रगतिशील या आधुनिक हो गया है?

इन दोनों प्रश्नों के उत्तर शायद नकारात्मक ही होंगे। भारतीय समाज में शादी एक पवित्र रिश्ता (बंधन) है, यह किसी अनुबंध अथवा सहमति का परिणाम नहीं है बल्कि यह तो ‘दो आत्माओं का मिलन’ है। आवश्यकता इस बात की है कि धारा 497 में लैंगिक समानता के अनुरूप संशोधन किया जाए। दैहिक स्वतंत्रता के नाम पर नैतिक मूल्यों को दरकिनार करने का परिणाम समाज में ‘विवाह’ संस्था के विघटन के रूप में सामने आ सकता है। साथ ही, इससे बच्चों व माता-पिता के बीच के संबंधों पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। संक्षेप में, हमें आमूलचूल परिवर्तनों की बजाय आधुनिक विचारों व सामाजिक मूल्यों के बीच सामंजस्य स्थापित करना होगा।
’सौरभ कोठिया, दिल्ली विश्वविद्यालय

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