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चौपाल: मजबूरी की हिंदी

हमारी भाषाओं का भविष्य हमारे बच्चों पर निर्भर है। हमारे बच्चे हिंदी से दूर होते जा रहे हैं। निजी विद्यालयों में जहां शिक्षा का माध्यम ही अंग्रेजी है, वहीं कुछ विद्यालयों में हिंदी बोलने पर जुर्माना भी लगाया जाता है। सरकारी प्राथमिक पाठशालाओं में भी धीरे-धीरे शिक्षा के माध्यम को अंग्रेजी किया जा रहा है।

Author August 24, 2018 3:14 AM
मॉरिशस में ग्यारहवें विश्व हिंदी सम्मेलन में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने बताया कि हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा बनाने के प्रयासों में भारत को एक बड़ी सफलता मिली है।

मॉरिशस में ग्यारहवें विश्व हिंदी सम्मेलन में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने बताया कि हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा बनाने के प्रयासों में भारत को एक बड़ी सफलता मिली है। अब संयुक्त राष्ट्र से परीक्षण स्तर पर हिंदी में समाचार बुलेटिन शुरू किया गया है। यह बात कुछ राहत देने वाली हो सकती थी, यदि अपने घर में हिंदी की स्थिति बेहतर होती। हालांकि कहा यह भी जा रहा है कि भारत में हिंदी की हालत पहले से बेहतर हुई है। लेकिन यह किस प्रकार की हिंदी है, वह समझना भी जरूरी है। इसे मजबूरी की हिंदी ही कहा जा सकता है।

हमारी भाषाओं का भविष्य हमारे बच्चों पर निर्भर है। हमारे बच्चे हिंदी से दूर होते जा रहे हैं। निजी विद्यालयों में जहां शिक्षा का माध्यम ही अंग्रेजी है, वहीं कुछ विद्यालयों में हिंदी बोलने पर जुर्माना भी लगाया जाता है। सरकारी प्राथमिक पाठशालाओं में भी धीरे-धीरे शिक्षा के माध्यम को अंग्रेजी किया जा रहा है। अभिभावक और सरकार सब यही चाहते हैं कि बच्चे का हिंदी का स्तर चाहे जैसा भी हो पर उसे अंग्रेजी अच्छी आनी चाहिए। इसलिए सब एक अंधी दौड़ में लगे हुए हैं। बहुत से कार्यालयों और संस्थानों, जहां हिंदी में काम चल सकता है, वहां भी अंग्रेजी को थोपा गया है। बहुत से ऐसे सूचना पट्ट हैं जिन्हें कभी कोई विदेशी तो क्या, कोई गैर हिंदी भाषी भारतीय भी नहीं पढ़ता, तब भी वहां अंग्रेजी को थोपा गया है। हिंदी को विश्व के सम्मान की नहीं, पहले हम भारतीयों के सम्मान की जरूरत है। यदि हम ही अपनी हिंदी का स्थान किसी दूसरी भाषा को देते हैं तो हिंदी के संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनने पर भी क्या लाभ होगा?
’रवींद्र कुमार राही, कैथल, हरियाणा

तबाही के पीछे
केरल में बाढ़ ने भारी तबाही मचाई है जिसमें अब तक तकरीबन 327 से ज्यादा लोगों की जान जा चुकी है। हजारों करोड़ का नुकसान हुआ है और लगभग दस लाख लोग विस्थापित हो चुके हैं। यह बाढ़ दरअसल बीते कई वर्षों से पर्यावरण के साथ छेड़खानी का भी ही एक नतीजा है इसलिए केवल बरसात या नदियों को इसके लिए जिम्मेदार ठहराना गलत होगा। लगातार जंगल काटे जाना, तालाबों की संख्या घटना, बांधों की समय-समय पर सफाई न करना, क्षमता से अधिक खनन, भारी मात्रा में जल व वायु प्रदूषण, नदियों के आसपास संवेदनशील मैदानी क्षेत्रों में मानव बस्तियां बसा देना आदि कारणों को भी केरल की तबाही के लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। यदि समय रहते इन समस्याओं को गंभीरता से नहीं लिया गया तो भविष्य में हमें इसका भारी खामियाजा उठाना पड़ सकता है।
’शक्ति प्रताप सिंह, लखनऊ

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