Jansatta choupal column artical about Prime Minister expressed concern over the disappearance of traditional games from ordinary life - चौपाल: लुप्त होते खेल - Jansatta
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चौपाल: लुप्त होते खेल

ये पारंपरिक खेल-खिलौने रचनात्मकता के साथ-साथ अलग-अलग प्रदेशों के कला-कौशल को भी दर्शाते हैं। जापान तथा अन्य देशों में हानिकारक प्लास्टिक के बजाय कागज के खिलौने के विकास पर जोर दिया जा रहा है।

Author June 8, 2018 4:56 AM
देशी खेल-खिलौनों का बच्चों के मानसिक और सामाजिक विकास में अहम योगदान है।(प्रतीकात्मक तस्वीर)

हाल ही में प्रधानमंत्री ने आम जीवन से पारंपरिक खेलों के लुप्त होने पर चिंता व्यक्त करते हुए उनके संरक्षण की बात कही। जिनकी जिंदगी बंद कमरे में इंटरनेट के ब्लू व्हेल गेम, कार्टून के कृत्रिम खेल और वीडियो के आधुनिक खेलों में सिमट कर रह गई है, उन बच्चों को जीवन के लिए जरूरी ऊर्जा आखिर मिले तो कहां से! ये खेल बच्चों के जीवन को विकास के बजाय विनाश की ओर ले जा रहे हैं। अब गुब्बारे, बांसुरी, सीटी, गिल्ली-डंडा, शतरंज, कलाबाजी के खेल देखने को नहीं मिलते। ये पारंपरिक खेल-खिलौने जीवन को परिवेश और श्रमशीलता से जोड़ते हैं। लकड़ी के खिलौने जहां काष्ठ-कला के हुनर को बढ़ावा देते हैं, वहीं पत्थरों पर की गई नक्काशी पाषाण कला से परिचित कराती है। मिट्टी के खिलौने जहां माटी-कला के हुनर की ओर ध्यान आकृष्ट करते हैं, वहीं कठपुतलियों के करतब राजस्थान के कला-कौशल की बानगी की प्रस्तुत करते हैं। केरल में नृत्य करती लकड़ी की गुड़िया, आंध्र में नव-विवाहित जोड़ों की मूर्तियां, बंगाल में लकड़ी के देवी-देवता बनाने का प्रचलन है।

ये पारंपरिक खेल-खिलौने रचनात्मकता के साथ-साथ अलग-अलग प्रदेशों के कला-कौशल को भी दर्शाते हैं। जापान तथा अन्य देशों में हानिकारक प्लास्टिक के बजाय कागज के खिलौने के विकास पर जोर दिया जा रहा है। जबकि हम अपने बच्चों को बचपन से ही मोटरकार, बाइक, तोप, तमंचे, रिवाल्वर, रिमोट और एंड्रॉयड फोन की प्रतिकृति थमा कर आखिर क्या संदेश देना चाहते हैं? देशी खेल-खिलौनों का बच्चों के मानसिक और सामाजिक विकास में अहम योगदान है।

बच्चों को पारंपरिक खेल-खिलौनों से अलग करने का ही नतीजा है कि आज उनसे उनका बचपन छिनता जा रहा है। उनकी संवेदना और समझ में कमी आती जा रही है। स्वस्थ मस्तिष्क का निवास स्वस्थ शरीर में ही संभव है। संतुलित विकास के लिए खेलकूद आवश्यक है। खेल के मैदान के अभाव में शिक्षा से खेलों का महत्त्व घटता जा रहा है। ऐसे में बच्चों को खेलकूद से जोड़े रखने के प्रति अभिभावकों की जवाबदेही अहम हो जाती है।
’देवेंद्र जोशी, महेशनगर, उज्जैन

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