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चौपाल: धारा के साथ

संविधान सभा के अध्यक्ष डॉक्टर आंबेडकर की स्पष्ट मनाही के बाद इस धारा को शेख अब्दुल्ला की जिद और नेहरू की भावुकता के चलते राष्ट्रपति के आदेश से संविधान में जोड़ा गया था।

Author नई दिल्ली | Published on: August 16, 2019 8:01 AM
इमेज क्रेडिट- indian express.com

पहले से कमजोर चल रही कांग्रेस पांच अगस्त को फिर गच्चा खा गई, जब केंद्र सरकार ने जम्मू कश्मीर से धारा 370 हटाने का बिल संसद में पेश किया। 2014 से चुनावों में लगातार पिट रही यह पार्टी एक बार फिर जनमानस को नहीं समझ पाई और धारा 370 के मुद्दे से जुड़ी भारतीय मानसिकता की संवेदनशीलता का एहसास नहीं कर सकी। नजीजतन, वह कश्मीर मुद्दे पर बंट गई और जनमानस में पिट गई। जिस राष्ट्रीयता व राष्ट्र बोध का उद्घोष कर भाजपा आगे बढ़ रही है कांग्रेस न उसे समझ पा रही है न समझने की कोशिश कर रही है। आज देश के पचास फीसद से अधिक मतदाता उस नई पीढ़ी के हैं जिसे कांग्रेस की स्वतंत्रता संग्राम में दी गई कुर्बानियों से कुछ लेना-देना नहीं है।

नई पीढ़ी के सोचने के प्रतिमान व मूल्य बदल गए हैं मगर कांग्रेस अपनी घिसीपिटी रीति-नीति पर चल कर देश में अपनी भूमिका तय करना चाहती है, जिसे नई पीढ़ी तो क्या, कांग्रेस के अंदर मौजूद नेता भी स्वीकार नहीं कर रहे और पार्टी को छोड़ते जा रहे हैं। बदले परिप्रेक्ष्य में कांग्रेस भले भाजपा की नीति पर न चले, पर उसे अत्यंत नूतन ढंग से शीर्ष नेतृत्व से लेकर कार्यकर्ता तक अपनी रीति-नीति, सोच, चिंतन, संरचना व कार्य शैली में आमूलचूल परिवर्तन करना होगा।

कांग्रेस को बोध नहीं था कि अनुच्छेद 370 देश की जनता के लिए अत्यंत संवेदनशील मुद्दा है और 1956 से अब तक झेलम में बहुत पानी बह चुका है। संविधान सभा के अध्यक्ष डॉक्टर आंबेडकर की स्पष्ट मनाही के बाद इस धारा को शेख अब्दुल्ला की जिद और नेहरू की भावुकता के चलते राष्ट्रपति के आदेश से संविधान में जोड़ा गया था। यह धारा जम्मू-कश्मीर के निवासियों को तो विशेष अधिकार देती थी पर शेष भारतीयों से गैर बराबरी करती थी। इसी धारा के कारण आजादी के समय जम्मू-कश्मीर में बसे पाकिस्तान से आए लाखों शरणार्थियों को मताधिकार से वंचित कर रखा गया था।

भारतीय संसद द्वारा पारित अधिकांश कानून वहां लागू नहीं होते थे। प्रदेश का ज्यादातर बजट केवल कश्मीर घाटी में खर्च होता था। अलगाववादियों के कुछ परिवार वहां फल-फूल रहे थे, आम आदमी की हालत खस्ता थी और बावजूद विशेष अधिकारों के कश्मीर के लोग पाकिस्तान का गुणगान करते थे। जवाहरलाल नेहरू ने उम्मीद जरूर की थी कि यह धारा धीरे-धीरे घिस जाएगी पर ऐसा हुआ नहीं। समय के साथ यह धारा देश की एकता व अखंडता के लिए खतरा बनती गई। इतनी कि भारत सरकार अपने कानूनों को लागू करने में लाचार थी।

विचारधारा से प्रतिबद्धता हो सकती है पर देश व जनमानस की मांग प्रतिबद्धता से ऊपर है। 1984 में जब खालिस्तान आंदोलन देश के लिए खतरा बन गया तो तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को सख्त कार्रवाई करनी ही पड़ी थी। बाद में मुख्यमंत्री बेअंत सिंह ने भी ऐसी ही सख्ती दिखाई। हालांकि दोनों को शहीद होना पड़ा पर जनमानस और समय की मांग सख्ती की थी। दोनों की कार्रवाई से जहां देश बच गया वहीं पंजाब में अमन भी कायम हो गया।

जम्मू-कश्मीर को देश का अभिन्न अंग बनाने के लिए धारा 370 का हटना जरूरी था जिसके लिए लोकतांत्रिक सख्ती अनिवार्य थी। हालांकि स्थानीय विधानसभा के प्रस्ताव का न होना लोकतांत्रिक प्रक्रिया का एक मुद्दा हो सकता है लेकिन देश हित में और परिस्थितिवश ऐसे निर्णय लेना आवश्यक हो जाए तो जनमानस की भावना ही लोकतंत्र का प्रतीक हो जाती है। कांग्रेस इन्हीं भावनाओं का अंदाजा नहीं लगा सकी। वह एक विपक्षी दल है और इस नाते विरोध करना उसकी सियासी जरूरत है पर राजा हरि सिंह के पुत्र कर्ण सिंह सरीखा दृष्टिकोण रख कर कांग्रेस अपनी भद पिटने से बचा सकती थी।
’हरबंस लाल धीमान, कथौली, नगरोटा सूरियां, हिमाचल प्रदेश

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