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चौपाल: मिलावट पर नकेल

अपने देश में मिलावटखोरी के खिलाफ आवाज उठाते हुए इसके आरोपी को मृत्युदंड देने की बात कही जाती रही है।

Author नई दिल्ली | August 13, 2019 4:01 AM
सांकेतिक तस्वीर।

मध्यप्रदेश में मिलावटखोरी के खिलाफ बड़ा और सख्त कदम उठाते हुए नकली घी बनाने के आरोप में उज्जैन के एक फैक्ट्री संचालक को रासुका में गिरफ्तार कर जेल भेजा गया है। आरोपी पेशे से डॉक्टर है और उज्जैन में क्लीनिक चलाता है। पिछले दिनों छापा मार कर उसकी फैक्ट्री से 800 किलो नकली घी और घी बनाने का सामान बरामद किया था। घी बनाने के लिए सोया तेल, वनस्पति घी और एसेंस (सुगंध) का इस्तेमाल किया जा रहा था। यह घी आसपास के ग्रामीण इलाकों और खासतौर से शादी-ब्याह में सप्लाई किया जाता था।

मिलावट के इस खेल में खाद्य विभाग के कर्मचारियों की मिलीभगत से इंकार नहीं किया जा सकता। यह पहला मौका है जब नकली दूध और उससे बने अन्य उत्पाद बनाने वालों के विरुद्ध सिलसिलेवार, प्रदेशव्यापी, सख्त और एकजुट कार्रवाई की जा रही है। मिलावट मुक्त मध्यप्रदेश के संकल्प के साथ उन्नीस जुलाई से शुरू किए गए इस अभियान के तहत प्रदेश में नकली खाद्य सामग्री बनाने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जा रही है।

प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री का साफ कहना है कि अभी दूध से बने पदार्थों में मिलावट के खिलाफ कार्रवाई हो रही है। इसके बाद सब्जियों को रासायनिक पदार्थों से पकाए जाने के गोरखधंधे का पर्दाफाश होगा। एक अनुमान के अनुसार बाजार में मिलने वाला 30 से 40 प्रतिशत सामान मिलावटी होता है। यह मिलावट इतनी चतुराई से की जाती है कि कोई इनके नकलीपन को आसानी से पकड़ नहीं पाता। मिलावटी मिठाई, आटा, दाल, पाम आॅइल की त्योहारी सीजन में ही नहीं सामान्य दिनों में भी बिक्री आम बात है।

अपने देश में मिलावटखोरी के खिलाफ आवाज उठाते हुए इसके आरोपी को मृत्युदंड देने की बात कही जाती रही है। लेकिन व्यवहार की वास्तविकता यह है कि मिलावटखोरी की जांच नमूना भर कर मामला दर्ज होने के बाद फाइलों में दब कर रह जाती है। आवश्यकता मिलावटखोरी पर पूरी तरह नकेल कसने की है। सख्त कानून बना कर जांच करने वाले अधिकारी व विभाग की भी जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए। त्वरित न्यायालय में मुकदमे चला कर तय समय सीमा में दोषी को कठोर दंड दिया जाए।

आम आदमी को मिलावटी सामान बेचना भी किसी हत्या से कम नहीं है। इसलिए उसकी सजा कठोर से कठोर होनी चाहिए। इसके लिए कानून की सख्ती के साथ ही सरकार की तीव्र राजनीतिक इच्छा शक्ति जरूरी है। मिलावटखोरी राष्ट्रव्यापी समस्या है लेकिन इसे लेकर पूरे देश में एक जैसा कानून आज भी नहीं है। अभी हालत यह है कि ओड़िशा, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश में दूध में मिलावट के अपराध पर उम्र कैद की सजा दिए जाने का प्रावधान है। जबकि अन्य राज्यों में ऐसा कानून नहीं होने पर सुप्रीम कोर्ट भी चिंता जता चुका है।

सख्त कानून बनाए जाने का जहां तक सवाल है, इन दिनों यह रिवाज-सा चल पड़ा है कि अगर कोई अपराध बढ़ रहा है तो उसकी सजा बढ़ाने की मांग उठने लगती है। जबकि नए कानून बनाने या सजा बढ़ाने से ज्यादा जरूरी है पहले से मौजूद कानूनों का सही करह से क्रियान्वयन। मिलावटखोरी के लिए कानून में सजा बढ़ाने से कानून के दुरुपयोग की आशंका बढ़ने का खतरा है। ऐसे में कोई भी कदम पर्याप्त विचार-विमर्श के बाद ही उठाया जाना चाहिए। इसे विडंबना ही कहा जाना चाहिए कि कानून बनाते समय या किसी घटना के घटित होने पर तो बहुत जोश दिखाया जाता है पर जब वास्तव में दोषी को सजा देने का मौका आता है तब सबके हाथ-पैर फूलने लगते हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि मिलावट मुक्त मध्यप्रदेश के संकल्प के साथ मिलावटखोरी के खिलाफ शुरू किए गई मध्यप्रदेश सरकार की कार्रवाई इसका अपवाद साबित होगी।
’देवेंद्र जोशी, महेशनगर, उज्जैन

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