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चौपाल: साफ संदेश

हाल ही में इमरान खान के अमेरिका दौरे में डोनाल्ड ट्रंप ने कश्मीर को लेकर मध्यस्थता का शिगूफा छोड़ा ही था जिससे भारतीय नीति निर्माताओं के कान खड़े होना स्वाभाविक था।

Author नई दिल्ली | Published on: August 14, 2019 3:07 AM
सांकेतिक तस्वीर।

अफगानिस्तान में बुरी तरह फंसा अमेरिका वहां से वापसी के लिए छटपटा रहा है और इस काम के लिए उसे पाकिस्तान की सर्वाधिक जरूरत महसूस हो रही थी। इसी कड़ी में ‘शेख अपनी-अपनी देख’ की नीति पर चलने वाला अमेरिका पाकिस्तान को खुश करने के लिए जम्मू-कश्मीर को लेकर कोई ऐसी नीति अपना सकता था जो भविष्य में भारत के लिए मुसीबत साबित हो सकती थी। हाल ही में इमरान खान के अमेरिका दौरे में डोनाल्ड ट्रंप ने कश्मीर को लेकर मध्यस्थता का शिगूफा छोड़ा ही था जिससे भारतीय नीति निर्माताओं के कान खड़े होना स्वाभाविक था।

इससे भारत समझ गया था कि अब हाथ पर हाथ धर कर बैठने का समय नहीं है लिहाजा, उसने एक झटके में धारा 370 और 35-ए हटाते हुए जम्मू-कश्मीर राज्य का पुनर्गठन कर अमेरिका-पाक की जोड़ी को साफ संदेश दे दिया कि कश्मीर उसकी कमजोर रग नहीं कि जिसे दबा कर भारत की भूमिका को अफगानिस्तान में नगण्य कर दिया जाए। भारत ने अफगानिस्तान में अब तक लगभग 25 हजार करोड़ रुपए खर्च किए हैं। उसने अफगानिस्तान में बिजलीघर, बिजली की लंबी-लंबी लाइनें, कई बांध, नहरें, स्कूल, पंचायत घर आदि क्या-क्या नहीं बनाए हैं! सबसे बड़ा निर्माण कार्य हुआ है ईरान और अफगानिस्तान को सीधे सड़क से जोड़ने का।

जरंज-दिलाराम सड़क 218 किलोमीटर लंबी है। इस पर भारत ने अरबों रुपए खर्च किए हैं। इस सड़क ने अफगानों की 200 साल पुरानी मजबूरी को खत्म किया। उन्हें अब अपने यातायात और आवागमन के लिए पाकिस्तान पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं है। अफगानिस्तान में हमारे हजारों डॉक्टरों, इंजीनियरों, शिक्षकों, पत्रकारों, अफसरों और विशेषज्ञों ने पिछले सत्तर साल में इतना जबर्दस्त योगदान किया है कि वहां के कट्टरपंथी भी भारत की तारीफ किए बिना नहीं रहते।

अमेरिका की अनुपस्थिति में पाकिस्तान खतरनाक तालिबानियों का इस्तेमाल भारत के खिलाफ कर सकता है। ऐसे में भारत कभी बर्दाश्त नहीं कर सकता कि अफगानिस्तान को लेकर बनने वाली किसी भी योजना में उसकी अनदेखी हो और वह भी जम्मू-कश्मीर को आड़ बना कर।
सीधे शब्दों में कहें तो धारा 370 के उन्मूलन के बाद नई परिस्थितियों में अमेरिका के लिए भारत की अनदेखी करना आसान नहीं होगा। अब देखना है कि वह कौन-सा लालच देकर पाकिस्तान से अफगानिस्तान पर मदद मांगेगा?

’राकेश सैन, वीपीओ लिदड़ां, जालंधर

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