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चौपाल: मंथन का समय

आजादी का दिन हमारे लिए अपनी गौरवगाथा बताने का वक्त तोहै ही, अपनी कमियों पर भी मंथन करने का समय है।

Author नई दिल्ली | August 15, 2019 3:58 AM
देश आजादी की तिहत्तरवीं वर्षगांठ मना रहा है।

देश आजादी की तिहत्तरवीं वर्षगांठ मना रहा है। आजादी का यह जश्न इस बार सही मायने में जम्मू-कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक मनाया जाएगा क्योंकि सरकार ने इस बार धारा 370 को हटा कर जम्मू-कश्मीर को हमारे और करीब ला दिया है। पिछले सात दशकों में दुनिया में भारत ने अपनी अलग पहचान बनाई है। आज भारत चंद्रयान-2 की मदद से चांद पर भी दुनिया के साथ कदम ताल करने को तैयार खड़ा है। चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर उतरने वाला भारत दुनिया का पहला देश बनने वाला है।

आजादी का दिन हमारे लिए अपनी गौरवगाथा बताने का वक्त तोहै ही, अपनी कमियों पर भी मंथन करने का समय है। यह एक ऐसा दिन है जब देश भर के स्कूली बच्चे स्टेडियम में जाकर देशभक्ति गीतों पर नाच-गाकर आजादी का जश्न मना रहे होते हैं, तो उसी स्टेडियम के बाहर बहुत से बच्चे तिरंगा और गुब्बारे बेचते दिख जाते हैं। उनके लिए आजादी का जश्न इस बात पर निर्भर करता है कि उनकी उस दिन कितनी बिक्री हुई। आजादी के सात दशक बाद भी उन बच्चों और उनके अभिभावकों के लिए पढ़ाई से ज्यादा महत्त्वपूर्ण पैसा कमाना है।

दूसरा मामला हाल ही में भोजन पहुंचाने वाली एक नामी कंपनी का देखने को मिला जिसके कर्मचारी से एक शख्स ने खाना लेने से महज इसलिए मना कर दिया कि खाना देने वाला युवक विशेष धर्म से तालुक रखता था। यहां के लोग दिवाली और ईद पर एक-दूसरे को गले मिलकर बधाई देते हैं। ऐसे में आजादी की दुहाई देकर किसी के हाथ से भोजन न लेना कैसे स्वीकार किया जा सकता है! क्या यह अन्न का अपमान नहीं है?

आज जब हर साल गणतंत्र दिवस पर राजपथ पर महिलाओं को हम एक से बढ़कर एक करतब करते देखते हैं तो हमारा दिल गर्व से भर उठता है। महिलाओं को पुरुषों के साथ यों कंधे से कंधा मिला कर चलते देख लगता है कि देश अब नए युग की ओर कदम बढ़ा चुका है। पर जब हम उन्नाव की बलात्कार पीड़िता को देखते हैं तो सिर शर्म से झुक जाता है। महज अपने साथ हुए अन्याय के खिलाफ आवाज बुलंद करके अगर किसी को अपना पूरा परिवार खोना पड़ जाए तो भला इसे कैसी आजादी कहा जाए!

आखिर हम यह कैसा समाज बनाते जा रहे हैं जिसमें कोई कसूरवार होकर भी सम्मान का हकदार है और कोई बेकसूर होकर भी समाज से मुंह छिपा कर जीने को मजबूर है? सत्रहवीं लोकसभा के चुनाव में तिरालीस फीसद दागी प्रत्याशी चुने गए हैं। इसकी बड़ी वजह लोगों का अब भी धर्म और जाति देख कर अपना नेता चुनना है। आजादी के जश्न के साथ हमें इस कड़वी हकीकत को भी स्वीकार करना पड़ेगा कि अब भी सुधार की गुंजाइश है। अगर हम सब मिल कर इन छोटी-छोटी कमियों को दूर कर लें तो आजादी के जश्न का रंग और अधिक गहरा हो सकता है।
’रोहित यादव, महर्षि दयानंद विवि, रोहतक

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