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चौपाल: दावे और हकीकत

सरकार ने नोटबंदी के पक्ष में तर्क रखा था कि कश्मीर में पत्थरबाजी में कमी आएगी और नक्सलियों की गतिविधियों पर लगाम लगेगा, लेकिन इन दोनों मामलों में भी बहुत ज्यादा असर नहीं पड़ा है।

Author September 1, 2018 2:02 AM
पीएम नरेंद्र मोदी। (पीटीआई फाइल फोटो)

भारतीय रिजर्व बैंक के मुताबिक नोटबंदी के बाद पांच सौ और हजार रुपए के 99.3 फीसद नोट वापस आ चुके हैं। इस रिपोर्ट ने सरकार को जरूर असहज किया होगा। दरअसल, उसे उम्मीद थी कि नोटबंदी से लगभग 3.5 लाख करोड़ रुपए बैंकों में वापस नहीं आएंगे क्योंकि वे कालेधन के रूप में हैं। मगर हुआ बिलकुल अलग। जब आभास हो गया कि अर्थव्यवस्था में लगभग सभी नोट वापस आ गाएंगे तब कहना शुरू कर दिया कि बैंकों में जमा होने से सभी रुपए ‘वाइट मनी’ नहीं हो जाएंगे। वित्तमंत्री ने बताया कि नोटबंदी के बाद 18 लाख लोगों की पहचान की गई है जिनके बैंक खाते में भारी राशि जमा हुई है; उनकी छानबीन हो रही है, नोटिस भेजे जा रहे हैं और गलत पाए जाने पर कार्रवाई भी होगी। लेकिन प्रश्न है कि क्या कार्रवाई करना इतना आसान है? विमुद्रीकरण के पक्ष में सरकार ने जो प्रमुख कारण गिनाए उनमें कालेधन पर लगाम लगाना, जाली नोटों को खत्म करना, आतंकी घटनाओं व देश विरोधी गतिविधियों पर रोक लगाना, आदि था परंतु वह भूल गई कि कालेधन का मात्र कुछ प्रतिशत ही नकदी के रूप में रहता है और ज्यादातर यह सोना, डाइमंड, शेयर, बेनामी संपत्ति व जमीन-जायदाद जैसे व्यवसायों में लगा होता है।

यदि हम नोटबंदी से जाली नोटों पर कुठाराघात वाला असर देखें तो यह भी बहुत सफल नहीं रहा। बेहद सुरक्षित समझे जाने वाले नए 200, 500 और 2000 के नोटों की भी नकल तैयार हो गई है। जालसाजों की नजर 2000 के नोटों पर ज्यादा है। वर्ष 2016-17 में 2000 के 638 नकली नोट पकड़े गए थे जो 2017-18 में बढ़कर 17,938 हो गए। चिंता की बात है कि जालसाजों ने 50 और 100 के छोटे नोटों को भी नहीं छोड़ा है और 100 रुपये के जाली नोटों में 35 फीसद और 50 रुपये के जाली नोटों में 157 फीसद की वृद्धि हुई है। विमुद्रीकरण का यदि सबसे ज्यादा नकारात्मक प्रभाव असंगठित क्षेत्र पर पड़ा जहां लाखों की संख्या में लोग बेरोजगार हुए और उन्होंने गांवों की ओर प्रस्थान किया। इसी के साथ विनिर्माण क्षेत्र में भी काम कम हुआ और पिछली तिमाही में जीडीपी की वृद्धि प्रभावित हुई।

दूसरी तरफ यदि हम विमुद्रीकरण के सकारात्मक पक्ष पर ध्यान दें जैसा वित्तमंत्री ने कहा कि काले धन पर चोट कर अर्थव्यवस्था को संगठित करना और भारत में टैक्स नियमों का पालन करने वाला समाज बनाना था। पर यहां प्रश्न है कि क्या अर्थव्यवस्था को संगठित करने और टैक्स नियमों के पालन के लिए हमारे पास अंतिम विकल्प नोटबंदी ही था या इसके और भी रास्ते थे? निस्संदेह देश में टैक्स रिटर्न भरने वालों की संख्या में वृद्धि हुई है। मार्च 2014 में आयकर रिटर्न की संख्या 3.8 करोड़ थी जो अब 2017-18 में बढ़कर 6.86 करोड़ हो गई, जो एक महत्त्वपूर्ण कामयाबी रही। पर हमें याद रखना होगा कि इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए देश की जनता और अर्थव्यवस्था ने बहुत बड़ी कीमत चुकाई है।

नोटबंदी की सही मायने में सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि आज भी भारत के लोगों का अपनी सरकार, अपने लोकतंत्र और अपने देश पर बहुत भरोसा है। सरकार के एक निर्णय ने सभी नागरिकों को एक लाइन में खड़ा कर दिया। इसके बावजूद जनता ने विरोध-प्रदर्शन नहीं किए और धर्य व साहस का परिचय दिया। भारत के साथ ही वेनेजुएला ने भी अपने यह नोटबंदी की थी जहां महज दस-पंद्रह दिन बाद लोगों ने व्यापक प्रदर्शन करना शुरू किया और आज तक वेनेजुएला अस्त-व्यस्त है। सरकार ने नोटबंदी के पक्ष में तर्क रखा था कि कश्मीर में पत्थरबाजी में कमी आएगी और नक्सलियों की गतिविधियों पर लगाम लगेगा, लेकिन इन दोनों मामलों में भी बहुत ज्यादा असर नहीं पड़ा है। निस्संदेह विमुद्रीकरण से देश को बहुत लाभ हुआ मगर उसकी कीमत भी चुकाई है जो भविष्य के लिए नजीर का काम करेगी।
’कन्हैया लाल पांडेय, मुखर्जी नगर, नई दिल्ली

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