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चौपाल: वक्त का तकाजा

आज का पढ़ा-लिखा युवा वर्ग ‘लोग क्या कहेंगे’ सरीखे लिहाज-संकोच के साथ नहीं जीना चाहता क्योंकि वह अच्छी तरह जानता है कि कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना! समाज की इन रूढ़िवादी मान्यताओं के लिए हमेशा बुजुर्गों को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

Author October 11, 2018 6:11 AM
तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक रूप से किया गाय है।

वर्षों से चली आ रही कोई परंपरा जब वर्तमान में प्रासंगिक न लगे तो उनमें संशोधन करना आवश्यक हो जाता है। हमारे समाज में जाति व्यवस्था एक ऐसा ही कलंक है। भारतीय संविधान ने अपनी स्थापना से लेकर अब तक आधुनिक विचारों को भारतीय संदर्भ में अपनाने का प्रयास किया है। ऐसे प्रयासों की चर्चा करें तो अंतरजातीय विवाह को प्रोत्साहन एक सराहनीय कदम है, जिसके अंतर्गत सरकार प्रत्येक वित्त वर्ष में अंतरजातीय विवाह करने वाले युगल को एक लाख रुपए की प्रोत्साहन राशि देती है।

आज का पढ़ा-लिखा युवा वर्ग ‘लोग क्या कहेंगे’ सरीखे लिहाज-संकोच के साथ नहीं जीना चाहता क्योंकि वह अच्छी तरह जानता है कि कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना! समाज की इन रूढ़िवादी मान्यताओं के लिए हमेशा बुजुर्गों को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। आत्ममूल्यांकन के लिए हम अपने भीतर झांकें तो पाएंगे कि प्रगतिशील होने का मुखौटा लगाए युवा पीढ़ी भी रूढ़िवाद के लि उतनी ही जिम्मेदार है। हम आधुनिक, सकारात्मक प्रगति तो चाहते हैं, लेकिन परिवर्तन की शुरुआत अपने घर से नहीं चाहते। हमें दूसरे के प्रगतिशील कार्य तो पसंद हैं, लेकिन स्वयं को कथित आदर्श पुत्र-पुत्री के रूप में प्रस्तुत करने का ढोंग बनाए रखते हैं। पुस्तकों या दीवारों पर लिखी हजार अच्छी बातें तब तक व्यर्थ हैं, जब तक उन्हें अमल में नहीं लाया जाता।

अंतरजातीय विवाह से न केवल जाति व्यवस्था की जड़ें टूटेंगी, बल्कि सामाजिक स्तर पर भाईचारे, अपनत्व की भावना भी बढ़ेगी। अब अगर हम सोचें कि रूढ़िवादी प्रथा की बगावत करने के लिए कोई अवतार लेगा तो मान कर चलिए कि आपकी और हमारी पढ़ाई मात्र औपचारिकता थी और कुछ नहीं। शिक्षित होने का मतलब ही है कि सही-गलत, उचित-अनुचित का अंतर कर सही चीजों के लिए न केवल आवाज उठाएं, बल्कि अपने स्तर पर प्रयास भी करें।
’सिद्धार्थ पटेल, वजीराबाद, दिल्ली

विभाजन का समाज
देश के किसी भी भाग में अन्य राज्यों से आए लोगों के साथ भेदभाव करते हुए मारपीट करना निहायत निंदनीय है लेकिन पहले महाराष्ट्र के कुछ भागों में और अब गुजरात में भी यह सब हो रहा है। अभी तक तो यह भेदभाव समाज के निम्न वर्ग के साथ हो रहा है, जब यह आग हर वर्ग में फैलेगी तब क्या हाल होगा? लोग भले ही मजबूरी में अपने जीवनयापन के लिए देश के दूसरे भागों में जाते हैं, लेकिन उससे कहीं ज्यादा वहां की अर्थव्यवस्था की प्रगति में सहयोग करते हैं। इससे किसी को अस्थायी रूप से राजनीतिक लाभ भले मिल जाए लेकिन इसके दूरगामी परिणाम भेदभाव करने वाले राज्य और वहां के लोगों को ही भुगतने होंगे। देश के हर बड़े नगर विशेषत: औद्योगिक और व्यावसायिक नगर में देश क्या, अन्य विदेश के लोग भी कार्यरत हैं। अच्छा यही होगा कि संबंधित राज्य सरकारें और राजनीतिक दल इसे रोकें, न कि आग में घी डालने का काम करें।
’यश वीर आर्य, देहरादून

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