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चौपाल: अंकों का खेल

स्कूल ही नहीं, यह प्रतिस्पर्धा घर, आस-पड़ोस सभी जगह है। जैसे, फलां का बच्चा तो इतनी जल्दी कंप्यूटर सीख गया लेकिन मेरा बेटा थोड़ा कमजोर है।

Author October 6, 2018 4:51 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

स्कूल और अंकों का खेल। क्या अंक ही किसी बच्चे का भविष्य तय करेंगे? जिसके जितने ज्यादा नंबर, वह उतना ही होशियार और जिसके कम नंबर वह किसी काम का नहीं! आज के समय में इस नंबर गेम से कोई नहीं बच पाया है। सरकारी स्कूल हो या नामी पब्लिक स्कूल, हर जगह इसी का बोलबाला है। स्कूल ही नहीं, यह प्रतिस्पर्धा घर, आस-पड़ोस सभी जगह है। जैसे, फलां का बच्चा तो इतनी जल्दी कंप्यूटर सीख गया लेकिन मेरा बेटा थोड़ा कमजोर है। घर में भी एक बच्चे की दूसरे बच्चे से अनावश्यक तुलना कि यह छह साल का था तो इतना सीख गया था मगर यह नहीं सीख पाया! और यह तुलना जीवन भर चलती रहती है। आश्चर्य की बात है कि हम सब बिना सोचे-समझे अंकों के खेल का हिस्सा बनते चले जाते हैं और इसके परिणाम से आंखें मूंद लेते हैं। परीक्षा परिणाम के समय बच्चों द्वारा की जाने वाली आत्महत्याएं इस बात का सबसे दुखद उदाहरण हैं। किसी बच्चे का ऐसा कदम उठा लेना उसके परिवार के लिए कितनी बड़ी क्षति होती है, हम समझ भी नहीं सकते हैं।

तो क्या यह जरूरी नहीं कि हर बच्चे को उसकी गति और विधि से सीखने के अवसर दिए जाएं ताकि उसके सीखने का सहज क्रम बाधित न हो। उसे स्वयं पल्लवित और पुष्पित होने का अवसर दिया जाए और हम सहयोगी की भूमिका में रहें! क्या जरूरी है कि बच्चे की अन्य बच्चे से बेवजह तुलना की जाए? ऐसा करने से अनावश्यक तनाव, चिंता और खीझ ही होगी और बच्चा जो कर सकता है वह भी नहीं करेगा। इससे तो बेहतर होगा कि बच्चे की उसी से तुलना की जाए कि आज से कुछ समय पहले वह यह कर पाता था मगर आज वह दो और नई चीजें कर पाता है। इससे बच्चे को खुशी होगी और उसे कहां मदद की जरूरत है यह ज्यादा साफ तौर पर निकल कर आ पाएगा। अंकों के खेल के कारण हमें बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ करने से बचना चाहिए और एक अच्छे और सजग माता-पिता और शिक्षक होने का परिचय देना चाहिए।
’प्रेरणा, भोपाल

अमेरिकी धौंस
अमेरिका ईरान से कच्चा तेल आयात करने और रूस से हथियारों का सौदा करने के लिए भारत को चेताता रहा है। उसकी यह चेतावनी अनुचित व निंदनीय है। जब भारत और उसके सहयोगी देश अन्य मुल्कों के साथ कोई भी सौदा करते हैं तो अमेरिका के पेट में दर्द क्यों होता है? भारत अमेरिका का अच्छा सहयोगी और मित्र राष्ट्र है, न कि बंधुआ मजदूर, जो उसके इशारे पर ही चलेगा। भारत के लिए जैसा अमेरिका है, वैसा रूस और अन्य देश हैं। अमेरिका की यह सोच उसकी सामंती प्रवृत्ति को उजागर करने वाली है, जो किसी भी दृष्टि से ठीक नहीं है।
’हेमा हरि उपाध्याय, खाचरोद, उज्जैन

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