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चौपाल: बड़ी चुनौती

इन दिनों हमारी अर्थव्यवस्था विभिन्न मोर्चों पर नकारात्मक दबाव से जूझ रही है। मौजूदा वर्ष की पहली तिमाही में 8.2 फीसद की वृद्धि दर्ज की गई है लेकिन आगे इस विकास दर को बनाए रखना मुश्किल होगा। अन्य संस्थाओं के अतिरिक्त भारतीय रिजर्व बैंक ने भी माना है कि आगामी तिमाही में वृद्धि दर सामान्य […]

Author October 30, 2018 5:44 AM
प्रतिकात्मक तस्वीर।(Express Photo by Praveen Khanna/Files)

इन दिनों हमारी अर्थव्यवस्था विभिन्न मोर्चों पर नकारात्मक दबाव से जूझ रही है। मौजूदा वर्ष की पहली तिमाही में 8.2 फीसद की वृद्धि दर्ज की गई है लेकिन आगे इस विकास दर को बनाए रखना मुश्किल होगा। अन्य संस्थाओं के अतिरिक्त भारतीय रिजर्व बैंक ने भी माना है कि आगामी तिमाही में वृद्धि दर सामान्य से भी कम रह सकती है। चिंता इस बात की है कि वृद्धि के कारक जोखिम की स्थिति में दिख रहे हैं। चुनाव के मद्देनजर सरकार किस तरह अर्थव्यवस्था को सुधार की ओर अग्रसर करेगी इसका कोई फार्मूला नजर नहीं आ रहा है।

अर्थव्यवस्था के लिए जो सबसे बड़ी समस्या उभर कर आ रही है वह बाजार से पूंजी का बाहर जाना है। इसके मुख्य तीन कारण हैं। पहला, रुपए के मूल्य में भारी गिरावट, दूसरा, विदेशी बाजार में कच्चे तेल की कीमत का निरंतर बढ़ना और तीसरा, अमेरिका का ब्याज दर को ऊंचा करना। इसके साथ ही सरकारी और निजी बैंकों का एनपीए बढ़ता जा रहा है। कुछ लुटेरे बैंकों से कर्ज लेकर रफूचक्कर हो गए। एक रिपोर्ट के अनुसार 2018 में भारत में प्रति व्यक्ति आय 2000 डॉलर है, जबकि अर्जेंटीना की 14,300 डॉलर और तुर्की की 10,500 डॉलर है। आयातित वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि हुई है। इसलिए इसका खमियाजा भारत की आबादी के बड़े हिस्से को उठाना पड़ेगा।

अपने विश्व आर्थिक दृष्टिपत्र में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने अप्रैल 2017 की रिपोर्ट में भारत के लिए 7.7 फीसद विकास का अनुमान लगाया था लेकिन जुलाई 2018 में उसमें सुधार करते हुए उसने अनुमानित वृद्धि घटाकर 7.4 फीसद कर दी है। नए वित्त वर्ष की पहली तिमाही में वृद्धि दर 8.2 फीसद भ्रामक लगती है क्योंकि अर्थव्यवस्था नोटबंदी और जीएसटी के बाद जुड़वां कारकों से जूझने की कोशिश कर रही थी। 8.2 फीसद की वृद्धि वास्तविकता के साथ छलावा है। इसलिए हम चालू वित्त वर्ष में 7.5 फीसद की वृद्धि और 4.8 फीसद की मुद्रास्फीति की उम्मीद करते हैं। इसके अतिरिक्त चालू खाते का घाटा भी तेजी से बढ़ता जा रहा है जो भारत को वैश्विक वित्तीय परिस्थितियों और बाजार में बिकवाली की चुनौतियों का मजबूती से मुकाबला करने में कमजोर बनाता है।

इसका कारण यह कि रुपया डॉलर के मुकाबले उम्मीद से ज्यादा कमजोर हुआ है। फिर भी हालत 2013 जैसे खराब नहीं हैं जब चालू खाते का घाटा जीडीपी के चार प्रतिशत से अधिक हो गया था। मुद्रास्फीति दस प्रतिशत के आंकड़े को छू रही थी और राजकोषीय घाटा जीडीपी के 4.8 प्रतिशत से अधिक था। तब बांड खरीद की संभावना घटाने के जिक्र भर से रुपया टूटने लगा था और उसमें 25 प्रतिशत की गिरावट आई थी। स्पष्ट है कि भारतीय अर्थव्यवस्था अनियंत्रित हो चुकी है। इसे मौजूदा बुरी स्थिति से उबारना एक बड़ी चुनौती है।
’विवेकानंद मिश्र, जोगिया, देवरिया, उत्तर प्रदेश

कब तक
लोकसभा चुनाव नजदीक आते ही राम मंदिर एक बार फिर सियासी मुद्दा बन गया है। अक्सर देखा जाता रहा है कि इस मुद्दे को चुनावी मौसम में राजनीतिक पार्टियां अपने घोषणापत्र में शामिल करके लोगों को गुमराह करने का प्रयास करती हैं। अयोध्या में विवादित ढांचे को गिराए हुए लगभग 23 साल हो गए हैं, लेकिन इस विवाद का हल अभी तक नजर नहीं आता है। खास बात यह कि चुनावी माहौल में राजनीतिक दलों के नेता इस पर बयानबाजी करके लोगों के जख्मों को हरा कर देते हैं। जब मामला सुप्रीम कोर्ट में है तो उस पर बयानबाजी करने से क्या फायदा! आखिर पार्टियां सिर्फ मंदिर-मस्जिद के नाम पर समाज को बांट कर वोट बैंक की राजनीति कब तक करती रहेंगी?
’राजकुमार पांडेय, रायपुर, छत्तीसगढ़

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