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चौपाल: रोजगार की शिक्षा

देश में उच्च शिक्षा प्रणाली में रटने की प्रवृत्ति अत्यधिक दिखाई देती है जो युवाओं को डिग्री हासिल करने के बाद रोजगार के काबिल नहीं बनाती। यह कौशल, उद्यमिता एवं नवाचारी प्रवृत्ति का अभाव चिंता का विषय है।

Author October 5, 2018 5:48 AM
प्रतीकात्मक चित्र

किसी भी देश के युवा उसकी संपन्नता के रखवाले होते हैं। इस संदर्भ में अगर भारत की बात करें तो यहां लगभग 65 प्रतिशत लोग 35 साल से कम उम्र के हैं जिनकी वजह से भारत को दुनिया का सबसे युवा देश कहा जा जाता है। लेकिन अहम सवाल है कि क्या हम इस अमूल्य जनांकिकीय लाभांश का समुचित उपयोग कर पा रहे हैं? जवाब है, नहीं क्योंकि बेरोजगारी की समस्या हमारे देश में विकराल रूप ले चुकी है। हर वर्ष अठारह लाख लोग काम करने की उम्र में प्रवेश कर रहे हैं। इसलिए भारत को 81 लाख नए रोजगार प्रति वर्ष सृजित करने की आवश्यकता है। इसके अलावा देश में उच्च शिक्षा प्रणाली में रटने की प्रवृत्ति अत्यधिक दिखाई देती है जो युवाओं को डिग्री हासिल करने के बाद रोजगार के काबिल नहीं बनाती। यह कौशल, उद्यमिता एवं नवाचारी प्रवृत्ति का अभाव चिंता का विषय है।

ऐसे में युवा जनसंख्या का समुचित उपयोग करने के लिए सरकार ने मुद्रा योजना, प्रधानमंत्री ग्रामीण डिजिटल साक्षरता अभियान, कौशल विकास योजना, स्टार्टअप योजना आदि को लागू तो किया है लेकिन ये सभी योजनाएं शहरी क्षेत्रों तक सीमित हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में इन योजनाओं का लाभ बेहद सीमित आबादी उठा रही है। इसलिए युवा जनसंख्या का लाभ उठाने की खातिर सरकार को चाहिए कि परंपरागत शिक्षा प्रणाली में बदलाव कर शिक्षा को रोजगार से जोड़े। युवाओं में कौशल और क्षमताओं का विकास किया जाना चाहिए। कौशल विकास योजनाओं का विकेंद्रीकरण भी आवश्यक है। युवा जनसंख्या में युग को बदल देने की ताकत होती है इसलिए यह मान्यता है कि सरकार व्यक्ति की योग्यता, कुशलता, दक्षता, नवाचारी प्रवृत्ति और अंतर्निहित क्षमता का प्रयोग करे तो उसे प्रभावी उत्पाद के रूप में बदल जा सकता है जो देश को प्रगति के शिखर पर ले जाने में सहायक सिद्ध होगा।
’पुष्पेंद्र पाटीदार, राउ, इंदौर, मध्यप्रदेश

भाषायी मर्यादा
स्वतंत्रता के बाद भारतीय राजनीति में नेहरू, पटेल, लोहिया एक-दूसरे का विरोध करते थे, भाषिक तंज भी करते थे लेकिन उन्होंने कभी भी एक-दूसरे के लिए स्तरहीन भाषा का प्रयोग नहीं किया। इस त्रिमूर्ति के बाद भी भारतीय राजनीति में विरोधियों पर स्तरहीन भाषिक आक्रमण अपवाद ही रहे। लेकिन पिछले तीन-चार आम चुनावों में विरोधियों पर जिस स्तरहीन भाषा में हमले हुए हैं वैसी भाषा अपवाद रूप में ही अन्य देशों में देखने को मिलेगी। आज जैसी भाषा हमारे नेता विरोधियों के लिए बोल रहे हैं, शिक्षित सभ्य समाज में वह स्वीकार्य नहीं है। इन दिनों विरोधियों के लिए चोर, कसाई, लल्लू, पप्पू, मौत का सौदागर, गधा आदि शब्द अब खूब इस्तेमाल होे रहे हैं। कुर्सी हथियाने की तीव्र भूख में नेता विरोधियों को चित करने के लिए घटिया हथकंडे अपना रहे हैं। किसी का धर्म, संस्कृति या राष्ट्रीयता भी उस पर हमलों का हथियार बना लिए गए हैं। श्मशान-कब्रिस्तान, मंदिर-मस्जिद भी इसी प्रकार के अस्त्र बन गए हैं। आखिर हमारे नेता नेता भाषायी मर्यादा का खयाल कब रखेंगे?
’शिवानी त्यागी, पंचलोक, मंडोला

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