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चौपाल: मासूमों की पीड़ा

सरकार पर दोषियों को बचाने का भरपूर प्रयास करने के आरोप सामने आए। अगर सही तरीके से जांच करवाई जाए तो कई दफ्न राज खुल सकते है। बालिका सुधार गृह प्रशासन इस घटना के लिए लिए पूर्ण रूप से जिम्मेदार है, क्योंकि उसकी मिलीभगत के बिना यह काम असंभव है।

प्रतीकात्मक तस्वीर।

बिहार के मुजफ्फरपुर में बालिका सुधार गृह में दो दर्जन से ज्यादा बच्चियों से बलात्कार की घटना स्तब्ध और शर्मसर करने वाली है। एक स्वयंसेवी संगठन की जांच में यह बात सामने आई कि लंबे समय से बालिकाओं का यौन उत्पीड़न किया जा रहा था। यह बात भी सामने आ रही है कि कुछ लड़कियों की हत्या कर दी गयी है। इस प्रकरण में बड़े लोगों एवं अधिकारियों की संलिप्तता से इनकार नहीं किया जा सकता। बिहार सरकार का रुख इस घटना को लेकर व्यापक लापरवाही भरा रहा। यही वजह है कि सरकार पर दोषियों को बचाने का भरपूर प्रयास करने के आरोप सामने आए। अगर सही तरीके से जांच करवाई जाए तो कई दफ्न राज खुल सकते है। बालिका सुधार गृह प्रशासन इस घटना के लिए लिए पूर्ण रूप से जिम्मेदार है, क्योंकि उसकी मिलीभगत के बिना यह काम असंभव है। इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष सीबीआई जांच होनी चाहिए और लाचार बच्चियों की सुरक्षा के नाम पर घिनौना कृत्य करने वाले तथा इससे जुड़े हर दोषियों को कड़ी सजा मिलनी चाहिए।

’जफर अहमद, मधेपुरा, बिहार

संवेदनहीनता की अति
दुनिया में हर साल नब्बे लाख लोग भूख और भूख से जुड़ी समस्याओं से मरते हैं। दिल्ली में हुई तीन बच्चियों की मौत की वजह भी भूख ही सामने आई है। चारों ओर शोरगुल मच रहा है, जिम्मेदारी जिन पर आनी चाहिए, वे चुप्पी लगाए बैठे हैं। भूख से मौत होती हैं, ये खबरें चिंताजनक हैं, लेकिन नई नहीं हैं। दिल्ली में तीन बच्चे अन्न-अभाव के चलते मौत का शिकार बने, इसकी कल्पना से मन सिहर जाता है। ऐसे दुखद मौके पर जो भी सवाल उठाता है, उसे घड़ियाली आंसू बहाने वाले लोग ऊल-जलूल बातों से चुप कर देते हैं। बच्चों की मां कुछ बताने की स्थिति में नहीं। इन बच्चों की मौत में भूख के साथ किसी बीमारी का भी हाथ हो सकता है।

देश में ऐसा कोई राज्य नहीं है, जहां कुपोषण और इलाज न होने से मौत न हो रही हो। रोना इस बात का है कि इस देश की जनता को नेता कुछ ऐसे झमेलों में उलझा देते हैं, जिनकी वजह से वे आपस में एक दूसरे से सिर-फुटव्वल करते रहते हैं। असली समस्याओं पर बात नहीं हो पाती। हैरानी है कि गरीब लोगों को वाजिब मजदूरी न देने वाले लोग और संस्थान भी भूख से मरने वाली बच्चियों के लिए संवेदना प्रकट कर रहे हैं। किसी ने कहा कि भूख से दूर-दराज के क्षेत्रों में मौत हो सकती है, लेकिन दिल्ली में यह सब कैसे हो गया! उन्हें शायद मालूम नहीं है कि दिल्ली के लोग सर्वाधिक संवेदनहीन हैं। दूर-दराज के लोग तो आज भी अड़ोसी-पड़ोसी का खयाल रखते हैं।
’सुभाष चंद्र लखेड़ा, द्वारका, दिल्ली

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