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चौपाल: तनाव के तार

तनावग्रस्तता की हालत में व्यक्ति का मस्तिष्क भलीभांति कार्य नहीं कर पाता। मन में हर समय एक असमंजस की स्थिति बनी रहती है। अनावश्यक रूप से पसीना छूटता है, कभी-कभी तो हाथ पांव भी कांपने लगते हैं। हालांकि हर कोई तनाव मुक्त होना चाहता है मगर परिस्थितियों का दबाव उसकी इस इच्छा पर ग्रहण लगा देता है।

आधुनिक युग ने हमारी जीवन शैली व रोजमर्रा की जिंदगी को न केवल गति प्रदान की है, बल्कि उसे पहले से काफी बेहतर बना दिया है। लेकिन कटु सत्य यह भी है कि कई बीमारियां आधुनिक युग की ही देन हैं जिनमें एक तनाव भी है। आंकड़ों को टटोला जाए तो यह बेहद चिंताजनक हकीकत है कि भारत में लगभग 77 फीसद लोग तनावग्रस्त हैं। व्यापारियों, बुद्धिजीवियों और मध्यवर्गीय लोगों में तनाव की व्यापकता अधिक है। तनाव दरअसल कई मानसिक व शारीरिक बीमारियों का कारण बन जाता है। किसी काम का अधिक दबाव, आर्थिक चिंताएं, जीवन में अनावश्यक भागदौड़, सहनशक्ति घट जाना आदि तनाव के प्रमुख कारण हैं। तनाव को यदि संक्रामक बीमारी कहा जाए तो गलत नहीं होगा क्योंकि एक तनावग्रस्त व्यक्ति समूचे वातावरण को तनावग्रस्त कर देता है जिसका प्रभाव अन्य कई लोगों के कार्यों और उनकी सेहत पर भी पड़ता है।

तनावग्रस्तता की हालत में व्यक्ति का मस्तिष्क भलीभांति कार्य नहीं कर पाता। मन में हर समय एक असमंजस की स्थिति बनी रहती है। अनावश्यक रूप से पसीना छूटता है, कभी-कभी तो हाथ पांव भी कांपने लगते हैं। हालांकि हर कोई तनाव मुक्त होना चाहता है मगर परिस्थितियों का दबाव उसकी इस इच्छा पर ग्रहण लगा देता है। लंबे समय तक तनावग्रस्त रहने का अर्थ है उच्च रक्तचाप, मधुमेह व हृदयाघात जैसी कई बीमारियों को दावत देना। इस तरह तनाव हमारे जीवन को अनेक रूपों में प्रभावित करता है। आज लोग जिस गति से प्रगति करते जा रहे हैं, उनके जीवन में अशांति भी उसी गति से बढ़ती जा रही है। कई लोग निरंतर प्राकृतिक वातावरण से दूर रहते हैं, वातानुकूलित कमरों में बैठकर अपने अधिकतर कार्य करते हैं और समाज के अन्य लोगों के साथ घुलना-मिलना कम कर देते हैं। ऐसे लोग अन्य लोगों से कहीं अधिक तनावग्रस्त पाए जाते हैं। जो लोग पहले ही तनाव रूपी बीमारी से ग्रस्त हैं, वे धूम्रपान व तंबाकू का सेवन कर कई और बीमारियों को न्योता देने का इंतजाम कर लेते हैं। कुछ लोग तनाव से मुक्ति पाने के लिए जिन नशीले द्रव्यों का सहारा लेते हैं, उनसे शरीर की दशा और भी बुरी हो जाती है।

मनोविश्लेषकों की राय है कि तनावग्रस्त होना इन दिनों व्यक्ति का स्वभाव बनता जा रहा है। यह पश्चिमी सभ्यता की प्रमुख देन है। पश्चिमी देशों के लोग तनाव से मुक्त होने के लिए हल्के-फुल्के व्यायाम, सात्विक आहार, योगासन, ध्यान आदि की तरफ उन्मुख हो रहे हैं। उनमें भारतीय शैली का जीवन जीने की इच्छा जोर पकड़ रही है। वे स्वच्छंद और मनमाने आचरण से ऊब चुके हैं और अपनी समस्याओं के निदान के लिए भारत की ओर देख रहे हैं। वे समय निकाल कर कई भारतीय कलाएं सीखने की कोशिश करते हैं जिससे उनका तनाव कम हो सके। ऐसे में हम भारतीयों में पश्चिमी शैली का जीवन जीने की ललक क्यों बढ़ती जा रही है, यह समझ से परे है। स्वाभाविक जीवन, प्राकृतिक एवं पौष्टिक भोजन, नशे से दूरी और हल्के व्यायाम तथा योगासन के जरिए तनाव की समस्या से मुक्ति पाई जा सकती है।
’प्रभात गुप्ता, नई दिल्ली

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