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चौपाल : युवा की दिशा

अपने देश के युवाओं का यह बड़ी विडंबनापूर्ण स्थिति यह है कि उन्हें बचपन से ही मां-बाप, लोकोक्तियों, मुहावरों, पाखंडपूर्ण साहित्य, कथित बाबाओं, गुरुओं और राजनीतिकों द्वारा जन्म के बाद से ही अंधविश्वास की घुट्टी पिलाई जाती है।

Author June 9, 2018 3:42 AM
हमारे देश के ज्यादातर बच्चे युवा होने पर आधुनिक ज्ञान-विज्ञान, प्रगतिशील प्रौद्योगिकी और साहित्य पढ़ने के बावजूद उनके अवचेतन मन में भरे अंधविश्वासों, पाखंडों से भरा मस्तिष्क मुक्त नहीं हो पाता! (प्रतीकात्मक तस्वीर)

हमारे देश के बच्चों और चीन, जापान, जर्मनी, इस्राइल आदि देशों के बच्चों में विशेष अंतर यह है कि विदेशों के बच्चे, आधुनिक विज्ञान, अंतरिक्ष के बारे में, सुदूर ग्रहों और तारों के बारे में, अपने समाज और देश के लोग कैसे उत्तरोत्तर सुखी और संपन्न हों, समाज में कैसे शांति-सद्भाव, भाईचारा और समरसता रहे, वहां की नदियां, वायु, प्रकृति और पर्यावरण कैसे प्रदूषण मुक्त रहे, कैसे शुद्ध रहे आदि विषयों पर हमेशा अध्ययनरत और प्रयत्नशील रहते हैं। लेकिन अपने देश के युवाओं का यह बड़ी विडंबनापूर्ण स्थिति यह है कि उन्हें बचपन से ही मां-बाप, लोकोक्तियों, मुहावरों, पाखंडपूर्ण साहित्य, कथित बाबाओं, गुरुओं और राजनीतिकों द्वारा जन्म के बाद से ही अंधविश्वास की घुट्टी पिलाई जाती है। तमाम तरह की अंधविश्वासी और पाखंडपूर्ण बातों, जैसे भूतप्रेत, वरदान, चमत्कार, पुनर्जन्म, पाप-पुण्य, छूआछूत, ऊंच-नीच, राहु-केतु द्वारा सूर्य और चंद्रमा को ग्रसना, पृथ्वी का शेषनाग पर टिका रहना, कल्पवृक्ष आदि भ्रमित और उल-जुलूल बातों को बच्चों के अवचेतन मन-मस्तिष्क में बुरी तरह से ठूंस कर भर दिया जाता है।

नतीजतन, हमारे देश के ज्यादातर बच्चे युवा होने पर आधुनिक ज्ञान-विज्ञान, प्रगतिशील प्रौद्योगिकी और साहित्य पढ़ने के बावजूद उनके अवचेतन मन में भरे अंधविश्वासों, पाखंडों से भरा मस्तिष्क मुक्त नहीं हो पाता! उनके मन में प्रगतिशील चिंतन से ज्यादा आशीर्वचन, वरदान और कृपा जैसे शब्द महत्त्वपूर्ण बने रहते हैं। उनके आदर्श गौतम बुद्ध, भगत सिंह, अल्बर्ट आइंस्टाइन और स्टीफन हॉकिन्स न होकर, शनिदेव, सत्यश्री सांर्इं बाबा या किसी मशहूर मंदिर के भगवान होते हैं। पारलौकिक भ्रम की दुनिया में ड़ूबे ऐसे लोगों को खुद पर भरोसा होने के बजाय किसी पार्क में किसी बाबा द्वारा किए जा रहे प्रवचन से चमत्कार होने का विश्वास रहता है। सामाजिक, वैचारिक और सांस्कृतिक दिवालिएपन की स्थिति में डूबी युवा पीढ़ी और पूरे समाज से इस देश के पर्यावरण, प्रदूषण, स्वच्छता, वैचारिक शुद्धता, शालीनता, विनम्रता या किसी सामाजिक बदलाव की कैसे उम्मीद की जा सकती है!
’निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद

खोखले नारे
मुझे बचपन के दिन याद आ रहे हैं जब लोग साग-सब्जी लाने बाजार जाते थे तो निश्चित रूप से अपने साथ झोला लेकर जाते थे। गांवों में लोग मछली खरीदते तो अपने घर के बर्तन में लाते। किराने की दुकान में दुकानदार कागज में सामान देते थे। आज यह सब पढ़ते हुए शायद पिछड़ेपन का एहसास होता होगा, क्योंकि आज हम छोटी-छोटी चीजें भी पॉलीथिन में लाते हैं और अपने आधुनिक होने के भाव से भर जाते हैं। फिर थोड़ी देर बाद पॉलीथिन को यों ही फेंक देते हैं। प्लास्टिक के कचरे मिट्टी में नहीं सड़ते और जलाने पर हानिकारक गैस छोड़ते हैं, जिससे मृदा और वायु प्रदूषण से पर्यावरण को क्षति पहुंच रही है। यों पर्यावरण प्रदूषण के अनेक कारण हैं और सबके बढ़ाने में हम सब का ही योगदान है। जब तक हम खुद के अंदर आमूल-चूल बदलाव नहीं लाएंगे, तब तक पर्यावरण संरक्षण के नारे खोखले होंगे।
’मंजर आलम, मधेपुरा, बिहार

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