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चौपाल: संकट में विविधता

इस पृथ्वी पर प्रथम जीव के आने के लाखों साल बाद मनुष्य आया। मगर दुख इस बात का है कि इस धरती पर मनुष्य के अविर्भाव से पहले इस धरती का पर्यावरण, प्रकृति और इसके सभी जीव-जंतु, यानी इसका समस्त जैव-मंडल बहुत ही संतुलित, निर्द्वंद्व और अद्भुत साहचर्य के ढंग से चलता रहा।

Author November 3, 2018 3:17 AM
पृथ्वी।

यह एक तथ्य है कि पृथ्वी और प्रकृति हमारी जरूरतों को बखूबी पूरी कर सकती है, लेकिन अनंत हवस की पूर्ति कभी नहीं कर सकती। पृथ्वी पर इंसान का जब से प्रादुर्भाव हुआ है और मनुष्य जबसे कथित विकसित हुआ है, तभी से इस पर रहने वाले जीव-जंतुओं की जान आफत में रही है। मनुष्य को जब से यह गलतफहमी हो गई है कि संपूर्ण पृथ्वी उसी के लिए ही है, तभी से इसके पर्यावरण, यहां के जंगलों, नदियों, झीलों, पहाड़ों, चरागाहों और धरती पर रहने वाले बहुत सारे जीवों के विलोपन और पर्यावरण असंतुलन की विषम समस्या उभर आई है।

इस पृथ्वी पर प्रथम जीव के आने के लाखों साल बाद मनुष्य आया। मगर दुख इस बात का है कि इस धरती पर मनुष्य के अविर्भाव से पहले इस धरती का पर्यावरण, प्रकृति और इसके सभी जीव-जंतु, यानी इसका समस्त जैव-मंडल बहुत ही संतुलित, निर्द्वंद्व और अद्भुत साहचर्य के ढंग से चलता रहा। लेकिन मनुष्य की हवस, लालच और अधिक से अधिक पाने की होड़ और सबसे अधिक मनुष्य की की इस सोच कि ‘वही दुनिया का मालिक है’ ने इस अभिनव साहचर्य और सामंजस्य को धराशायी कर दिया।

यह सर्वमान्य और न्यायसंगत बात है कि इस धरती पर सभी जीवों को रहने का उतना ही अधिकार है, जितना मनुष्य को। मगर मनुष्य ने इस न्यायपरक बात को मानने से इनकार करके इस पृथ्वी के संसाधनों और अपने समकक्ष अन्य प्राणियों को भी संसाधन मान लिया है। इन पर अपना अधिकार मान कर इनका अपने स्वार्थ के अनुसार उपयोग-दुरुपयोग करना शुरू कर दिया। किस जीव की पीठ पर बैठ कर दौड़ लगानी है, किस जीव से बोझ ढुलवाना है या हल चलवाना है, किस जीव को शौकिया बंदूक से जान मार देना है, जंगलों में आग लगा देना, उनका विनाशक तरीके से दोहन करना, अपनी बस्तियों, शहरों और कल-कारखानों के जहरीले और तमाम गंदी चीजों को नदियों में डाल कर उन्हें गंदा करने के साथ-साथ समुद्र को प्रदूषित कर देना, अत्यधिक पेट्रोल और डीजलचालित वाहनों, वातानुकूलित यंत्रों और कारखानों से विषाक्त गैस और प्रदूषण फैला कर प्राणरक्षक ओजोन परत सहित समस्त पृथ्वी के वायुमंडल को ही प्रदूषित करना, जंगलों के अत्यधिक दोहन और चमचमाती, चौड़ी सड़क बनाने के लोभ में वन्य जीवों, ग्लेशियरों और नदियों को ‘मार डालना’ आधुनिक मनुष्य के कृत्य के कुछ नमूने हैं।

वर्तमान में मनुष्य के इन कृत्यों से पर्यावरण और पृथ्वी पर रहने वाले सभी पालतू और वन्य जीवों का जीवन गंभीर संकट में है। अगर यह कथित सभ्य मानव अब भी अपने ऐसे कृत्यों से बाज नहीं आएगा तो संभव है कि कुछ सौ वर्षों में पर्यावरण के साथ इसके सभी जीव और प्रजातियां और खुद मनुष्य भी धरती से विलुप्त हो जाए! इसलिए अगर मानव अपने को इस जैव मंडल का सबसे विकसित प्राणी मानता है तो उसका यह अनिवार्य कर्तव्य है कि वह ऐसा कोई कार्य न करे, जिससे पृथ्वी की जैव विविधता का नाश हो।
’निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद

शहर बनाम गांव
देश के दूसरे इलाकों की तरह इन दिनों छत्तीसगढ़ के मुख्य शहरों को स्मार्ट सिटी बनाने की कवायद चल रही है। बिलासपुर सिटी को ‘स्मार्ट’ कहे जाने के बाद हाल ही में कोरबा, राजनंदगांव और सीतापुर को स्मार्ट सिटी बनाने की खबर आई है। लेकिन सत्ता पर काबिज सरकार को यह भी जान लेना चाहिए कि जब तक गांव के लोगों का जीवन बेहतर नहीं होगा, पूरे देश का विकास संभव नहीं है। इसलिए सुविधाओं को शहरों में केंद्रित करने के बजाय गांवों में अच्छी सुविधाओं का होना जरूरी है। गांव में आराम से रहने लायक सुविधाओं का होना ही गांव का ‘स्मार्ट विलेज’ होना है। शहरों को स्मार्ट बनाने का फायदा किसे होना है, सब जानते हैं।
’रोशन कुमार, कोरबा, छत्तीसगढ़

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