ताज़ा खबर
 

चौपाल: गवाह की सुरक्षा

आपके समाचार पत्र में प्रकाशित लेख ‘गवाह की सुरक्षा की दरकार’ वास्तविकता के धरातल पर खड़े होकर कटु सत्यता के साथ लिखा गया है, जो वास्तव में इस देश में हो रहा है। भारतीय न्यायिक प्रक्रिया में गवाहों की अति-महत्त्वपूर्ण स्थिति और उनकी सुरक्षा का गहन विश्लेषण किया गया है।

Author December 18, 2018 3:57 AM
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक तौर पर। (Source: Dreamstime)

आपके समाचार पत्र में प्रकाशित लेख ‘गवाह की सुरक्षा की दरकार’ वास्तविकता के धरातल पर खड़े होकर कटु सत्यता के साथ लिखा गया है, जो वास्तव में इस देश में हो रहा है। भारतीय न्यायिक प्रक्रिया में गवाहों की अति-महत्त्वपूर्ण स्थिति और उनकी सुरक्षा का गहन विश्लेषण किया गया है। भारतीय न्यायिक व्यवस्था के बारे में भारतीय जनमानस में एक आम धारणा है कि एक अपराधी तक न्यायालय परिसर में जज के सामने अपने दुश्मन को गोली मार कर हत्या कर दे, उसके खौफ से कोई भी उसके खिलाफ गवाही न दे और उसकी तरफ से उसके साथी अदालत में ये गवाही दे दें कि उस व्यक्ति को उसने नहीं मारा है, तो वह भारतीय न्याय व्यवस्था से बाइज्जत बरी हो जाएगा। कहने का तात्पर्य यह है कि भारतीय न्यायिक प्रक्रिया पूरी तरह गवाहों पर आधारित है।

आज भारतीय समाज में बर्बरता, नृशंसता, अमानवीयता, क्रूरता, झूठ-फरेब, धोखाधड़ी आदि प्रवृत्तियों का वर्चस्व है। इसी प्रवृति के लोग सत्ता में नीचे से ऊपर तक सत्तासीन हैं। चूंकि शासन-प्रशासन में इन्हीं प्रवृत्ति के गुणों से संपन्न व्यक्तियों का वर्चस्व है। जाहिर है, वे अपने इन्हीं पाश्विक और बाहुबल से गवाहों को धमका कर और हत्या कर न्यायोचित निर्णय से अदालत को बाधित कर देते हैं। ऐसे माहौल में एक ईमानदार व्यक्ति का जीना मुहाल हो रहा है। तो वहीं, भारत के सूदूर ग्रामीण, कस्बाई क्षेत्रों और छोटे शहरों में तो बड़े अपराधियों का अपने खिलाफ गवाही देने वाले गवाहों को जान से मारना एक आम बात है। अगर अपराधी बाहुबली नहीं है तो गवाह की हत्या राष्ट्रीय मीडिया का हिस्सा भी नहीं बनतीं। केंद्र सरकार की तरफ से तैयार गवाह सुरक्षा योजना-2018 की सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी स्वागत योग्य कदम है, लेकिन भारत में केवल कानून बना देने से गवाहों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हो पाएगी, जब तक भारतीय राजनीति में अपराधियों का प्रवेश बंद नहीं किया जाएगा।
’निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद

बाजार की मुश्किल
बाजारवाद की जड़ें इस तरह से पैर पसार रही हैं कि कोई भी इससे अछूता नहीं है। स्कूल हों या अस्पताल, सभी जगह यह समस्या है। स्कूलों की व्यवस्था भी ऐसी हो गई है कि शिक्षा के नाम पर बच्चों से अधिक फीस वसूली जाती है और उन्हें स्कूली शिक्षा न देकर कोचिंग के भरोसे छोड़ दिया जाता है। बच्चे भी जानते हैं कि बिना कोचिंग जाए आगे नहीं बढ़ सकते। स्कूलों में बच्चों को ऐसी शिक्षा भी नहीं दी जा रही है जिससे उनका सर्वांगीण विकास हो। इसी तरह अस्पतालों में भी लोगों पर तरह-तरह के दबाव बनाए जाते हैं। मरीजों को अनेक तरह की जांच लिख दी जाती हैं जिससे उन्हें आर्थिक नुकसान तो होता ही है, साथ ही मानसिक रूप से भी प्रताड़ित होते हैं। कई बार देखने में आया है कि बड़े अस्पतालों में तो मरीज के शव को रख कर वेंटीलेटर के नाम पर लोगों से पैसा खींचा जाता है। इस बाजारवाद की वजह से ही सरकारी स्कूलों का डब्बा गोल हो रहा है। हमारी सरकारें भी नहीं चाहती कि यह व्यवस्था बदले, क्योंकि कहीं न कहीं यह बाजारवाद उनको भी अप्रत्यक्ष रूप से लाभ पहुंचा रहा है। सरकारी व्यवस्था भी सिर्फ अपना फायदा देख रही है। इन्हीं सबका फायदा बड़े-बड़े लोग उठा रहे हैं।
’मुकेश शेषमा, झुंझुनू

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App