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चौपाल: खतरे में वन्यजीव

देश में इन दिनों वन्य जीवों की जान सांसत में है। कई प्रजातियां तो लुप्त होने के कगार पर हैं। विकास की अंधी दौड़ में जंगल खत्म हो रहे हैं। वन्य जीवों के लिए यही सबसे बड़ा खतरा है। सरकार एक तरफ बाघ को राष्ट्रीय पशु घोषित करती है और दूसरी तरफ उसके संरक्षण में नाकाम साबित हो रही है।

Author December 18, 2018 4:11 AM
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है।

खतरे में वन्यजीव
देश में इन दिनों वन्य जीवों की जान सांसत में है। कई प्रजातियां तो लुप्त होने के कगार पर हैं। विकास की अंधी दौड़ में जंगल खत्म हो रहे हैं। वन्य जीवों के लिए यही सबसे बड़ा खतरा है। सरकार एक तरफ बाघ को राष्ट्रीय पशु घोषित करती है और दूसरी तरफ उसके संरक्षण में नाकाम साबित हो रही है। कुछ दिन पहले ही खबर आई थी कि एक बाघिन को सिर्फ उसके पंजे के लिए मार दिया गया और प्रशासन को भनक तक नहीं लगी। देश में राष्ट्रीय पशु की ऐसी स्थिति चिंता का विषय है। कुछ दिन पहले ही सिनेमाघरों में 2.0 फिल्म लगी थी, जिसमें चीख-चीख कर कहा गया है कि मोबाइल से निकलने वाले हानिकारक सिग्नल से पक्षी मर रहे हैं। देश में आठ से दस मोबाइल कंपनियों की जगह दो से तीन मोबाइल कंपनियों की जरूरत है। इसके बावजूद जनता में खास परिवर्तन नहीं दिख रहा है। इस समस्या से निपटने के लिए नई-नई योजनाओं का निर्माण कर उस पर अमल करने की जरूरत है। इसके लिए हम छोटी-छोटी कोशिशों से मदद कर सकते हैं। छत पर एक छोटी-सी कटोरी में भी पानी भर कर रख सकते हैं। इन प्रयासों से बड़ी आपदा से बचा जा सकता है।
’रोशन कुमार, कोरबा, छत्तीसगढ़

विषय की उपेक्षा
आज के युग में रोजगारपरक शिक्षा के लिए प्रौद्योगिकी व वाणिज्य शिक्षा की ओर जोर दिया जा रहा है, जो जरूरी भी था। मगर इसी के साथ सरकारों और समाज ने सामाजिक विज्ञान की शिक्षा की उपेक्षा की। भारत जैसे जटिल सामाजिक समीकरणों वाले देश में लोगों का रुझान सामाजिक विज्ञान की ओर न होना भयावह है, क्योंकि सामाजिक विज्ञान के जरिए समाज के विभिन्न आयामों और उनकी समस्याओं का भान होता है। एक समुदाय दूसरे समुदाय की परेशानियों को समझता है, जिससे सामाजिक समन्वय का भाव उत्पन्न होता है।

लेकिन आज के फेक न्यूज़ के युग में लोग गलत सूचनाओं के जाल में फंस कर छद्म सामाजिक चेतना विकसित कर रहे हैं। ऐसे में इससे निपटने के लिए लोगों को जागरूक करने की बात उठती है। लोगों को जागरूक करने के लिए आसपास की घटनाओं की सही अवधारणात्मक समझ और उनके प्रति वैज्ञानिक दृष्टिकोण की आवयश्कता है। यह आवयश्कता सामाजिक विज्ञान के प्रसार से ही पूरी हो सकती है। भले ही सामाजिक विज्ञान की शिक्षा अधिक रोजगार व उच्च आर्थिक गति को प्रोत्साहित नहीं करती, मगर इससे समाज में सौहार्दपूर्ण चेतना का निर्माण होता है। इससे समाज को स्थिरता मिलती है और आपस में संवाद कायम होता है। यह भारत के संक्रमणकालीन दौर की जरूरत भी है और विकासशील से विकसित बनने के लिए भारत को इस क्षेत्र में भी सहयोग की जरूरत है।

आज सामाजिक विज्ञान को बढ़ावा देना आज की जरूरत है, इसके लिए महाविद्यालयों के आधारभूत सुधारों के साथ-साथ शिक्षा नीति में सामाजिक विज्ञान व साहित्य का महत्त्व को समझना जरूरी है। बाल साहित्य को प्रोत्साहित करना व स्कूल से ही छात्रों का इस ओर रुझान बढ़ाना आवश्यक है।
’रजत सारस्वत, गोविंदगढ़, अलवर

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